
ज्योतिष एवं द्वारका शारदा पीठाधिश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी प्रज्ञानानन्द सरस्वती महाराज ने कहा कि उनके गुरु द्वि पीठाधिश्वर शंकराचार्य स्वामी श्री स्वरूपानन्द सरस्वती महाराज के ब्रह्मलीन होने के उपरांत दोनों पीठों के आचार्य को लेकर जो हुआ वह धर्म के अनुकूल नही हुआ, सनातन धर्म की रक्षा के लिए धर्म के अनुरूप धर्म की व्यवस्था का संचालन किए जाने की जरुरत है।
द्विपीठाधिश्वर स्वामी प्रज्ञानानन्द जी महाराज भगवान बद्रीविशाल के कपाट खोले जाने के अवसर पर श्री बद्रीनाथ धाम पहुंचे धार्मिक कार्यक्रम मे सम्मलित होने के उपरांत संवाद दाताओं से वार्ता करते हुए उन्होंने कहा कि शंकराचार्य का पद धर्म की रक्षा का पद है न कि सम्पत्ति हासिल करने का
उन्होंने कहा कि देश के महान विद्वानों और काशी दंडी सभा तथा संत समाज ने उन्हें धर्म की रक्षा के लिए ही दोनों पीठों का आचार्य पद ग्रहण करने का आग्रह किया, उन्होंने कहा कि दोनों पीठों के लिए योग्य आचार्य उपलब्ध होने पर वे स्वयं भी पद त्यागने मे देर नहीं करंगे लेकिन धर्म व शंकराचार्य पद के साथ खिलवाड़ नहीं होने देंगें।
द्विपीठाधिश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी प्रज्ञानानन्द महाराज ने कहा कि ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती महाराज की समाधीष्ट से पूर्व ही उनके शरीर के सम्मुख स्वयं का पट्टाभिषेक करना क्या शास्त्र सम्मत है? और ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द महाराज ने जीवित रहते हुए ही लिखित बयान जारी कर स्पष्ट कर दिया था कि उन्होंने किसी भी शिष्य को अपना उत्तराधिकारी नहीं बनाया है।
स्वामी प्रज्ञानानन्द सरस्वती जी महाराज ने कहा कि उन्होंने इस पद को अहंकार के लिए नहीं धर्म सम्पदा को आगे बढ़ाने के लिए ग्रहण किया है।
