
हिमालय की गोद में बसी देवभूमि उत्तराखंड में पर्व केवल उत्सव नहीं होते, वे आस्था, इतिहास और लोकजीवन की गहराई से जुड़ी परंपराएँ होते हैं। यहाँ के त्योहारों में केवल रंग और उल्लास नहीं बल्कि सदियों की संस्कृति, धर्म और सामाजिक एकता की झलक दिखाई देती है। इस वर्ष चमोली जनपद के गोपेश्वर स्थित प्राचीन गोपीनाथ मंदिर और देवभूमि के द्वार कहे जाने वाले ज्योतिर्मठ (जोशीमठ) के भगवान नृसिंह मंदिर में मनाई गई होली ने यही साबित किया कि उत्तराखंड में त्योहार केवल मनाए नहीं जाते, बल्कि इतिहास और आस्था के साथ जिए जाते हैं।

गोपीनाथ मंदिर: जहाँ शिव की नगरी में गूंजते हैं कृष्ण के रंग
चमोली मुख्यालय गोपेश्वर में स्थित गोपीनाथ मंदिर उत्तराखंड के प्राचीनतम शिव मंदिरों में से एक माना जाता है। इतिहासकारों के अनुसार इसका निर्माण लगभग 9वीं से 11वीं शताब्दी के बीच कत्यूरी राजाओं या प्रारंभिक गढ़वाल शासकों के काल में हुआ माना जाता है। मंदिर की स्थापत्य शैली उत्तराखंड की प्राचीन नागर शैली की झलक प्रस्तुत करती है।
मंदिर परिसर में स्थापित विशाल अष्टधातु का त्रिशूल इस मंदिर की सबसे अनोखी पहचान है। स्थानीय परंपराओं और इतिहासकारों के अनुसार यह त्रिशूल लगभग 16 फीट ऊँचा है और इसका वजन सैकड़ों किलो बताया जाता है। धातु विज्ञान के विशेषज्ञ भी इसे प्राचीन भारतीय धातु शिल्प का अद्भुत उदाहरण मानते हैं।
लेकिन इस मंदिर की विशेषता केवल इसका स्थापत्य या त्रिशूल नहीं है। यहाँ मनाई जाने वाली होली की परंपरा भी उतनी ही अद्भुत है।
स्थानीय लोकमान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण की रासलीला के समय भगवान शिव स्वयं इस लीला के साक्षी बनने के लिए इस क्षेत्र में आए थे। उसी स्मृति में यहाँ भक्ति और लोक परंपरा से जुड़ी विशेष होली मनाने की परंपरा चली आ रही है।
जब गोपीनाथ मंदिर परिसर में होली का आयोजन होता है तो वातावरण अद्भुत हो उठता है।
ढोल-दमाऊं की गूंज, पारंपरिक कुमाऊँनी-गढ़वाली होली गीत और गुलाल की उड़ती रंगत के बीच पूरा परिसर भक्ति और लोक संस्कृति के रंगों से सराबोर हो जाता है।
इस आयोजन की एक महत्वपूर्ण परंपरा यह है कि इसमें आसपास के गाँवों की सामूहिक भागीदारी होती है। ग्रामीण पारंपरिक वेशभूषा में मंदिर परिसर में पहुँचते हैं और पीढ़ियों से चली आ रही इस परंपरा को निभाते हैं।
आज के समय में यह देखकर संतोष होता है कि बड़ी संख्या में युवा भी इस आयोजन से जुड़ रहे हैं। उनकी सक्रिय भागीदारी यह साबित करती है कि आधुनिक समय में भी उत्तराखंड की सांस्कृतिक जड़ें मजबूत हैं।

ज्योतिर्मठ की होली: जब पूरा नगर एक रंग में रंग गया
देवभूमि के प्रवेश द्वार कहे जाने वाले ज्योतिर्मठ (जोशीमठ) में इस वर्ष होली का उत्सव एक ऐतिहासिक स्वरूप में सामने आया। नगर के इतिहास में पहली बार इतने बड़े स्तर पर संपूर्ण नगर का साझा होली मिलन समारोह आयोजित किया गया।
इस भव्य आयोजन के लिए चुना गया स्थान था — भगवान नृसिंह का प्राचीन मंदिर परिसर।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह वही पावन स्थल है जहाँ भगवान विष्णु ने अपने परम भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए नृसिंह अवतार धारण कर अत्याचारी हिरण्यकश्यप का वध किया था। कहा जाता है कि युद्ध के बाद भगवान नृसिंह का रौद्र स्वरूप शांत हुआ और वे इसी स्थान पर विराजमान हुए।
ज्योतिर्मठ का यह नृसिंह मंदिर बद्रीनाथ धाम की परंपरा से भी जुड़ा हुआ है। शीतकाल में जब बद्रीनाथ धाम के कपाट बंद होते हैं, तब भगवान बद्रीनाथ की पूजा की परंपरा ज्योतिर्मठ क्षेत्र से ही संचालित होती है। इस कारण यह स्थान धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
इसी धर्म और विजय के प्रतीक स्थल पर आयोजित होली मिलन ने सामाजिक समरसता का दुर्लभ उदाहरण प्रस्तुत किया।
नगर के विभिन्न मोहल्लों, समुदायों और आयु वर्ग के लोग एक ही स्थान पर एकत्र हुए।
भगवान नृसिंह के जयकारों, ढोल-दमाऊं की थाप और पारंपरिक होली गीतों के बीच गुलाल उड़ता रहा और पूरा वातावरण भक्ति और भाईचारे के रंगों से भर उठा।
यह आयोजन केवल रंगों का उत्सव नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक जागरण का प्रतीक भी बनकर सामने आया।

देवभूमि का संदेश
गोपेश्वर के गोपीनाथ मंदिर की पारंपरिक होली और ज्योतिर्मठ के ऐतिहासिक होली मिलन समारोह ने यह स्पष्ट कर दिया कि उत्तराखंड की संस्कृति केवल अतीत की स्मृति नहीं बल्कि वर्तमान की जीवंत शक्ति है।
एक ओर गोपीनाथ मंदिर की होली सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा और लोक संस्कृति की जीवित पहचान है, वहीं दूसरी ओर ज्योतिर्मठ का सामूहिक होली मिलन सामाजिक एकता और सांस्कृतिक जागरण का नया अध्याय लिखता दिखाई देता है।
हिमालय की गोद में बसे इन पवित्र स्थलों पर होली केवल रंगों का त्योहार नहीं है —
यह आस्था का उत्सव है, संस्कृति का उत्सव है और समाज को जोड़ने वाली एक अदृश्य डोर का उत्सव है।
और शायद यही कारण है कि देवभूमि में होली खेली नहीं जाती
वह इतिहास, श्रद्धा और परंपरा के रंगों से रची जाती है।
