कभी–कभी किसी व्यक्ति का जीवन केवल उसके कर्मों से नहीं, बल्कि उसके स्वभाव, उसकी सोच और उसकी मिट्टी से जुड़ाव से महाकाव्य बन जाता है। कैप्टन (रि.) दामोदर प्रसाद मैंदोली, गाँव बाँजबगड, नन्दा नगर, जिला चमोली के ऐसे ही गौरव थे—साहस के प्रतीक, सेवा के पर्याय और सादगी के धनी। उनका चले जाना सिर्फ एक परिवार या एक गांव की क्षति नहीं, बल्कि उस सोच का अवसान है जो देश की सेवा और अपनी धरती की रक्षा को समान भाव से देखती थी।

सीमा से सियाचीन तक—कर्तव्य का पर्वत जैसा साहस
सेना में रहते हुए उन्होंने जिन मोर्चों पर अपनी ड्यूटी निभाई, वहां सिर्फ हिमालय की ठंड ही नहीं, बल्कि मौत का साया भी कदम–कदम पर चलता था।
सियाचीन की बर्फीली ऊंचाइयों से लेकर सीमांत की दुर्गम चौकियों तक—कैप्टन मैंदोली ने हर चुनौती को मुस्कान के साथ स्वीकार किया।
वे सिर्फ एक अधिकारी नहीं, बल्कि ऐसे योद्धा थे जिनकी शांत आँखों में जिम्मेदारी और देशभक्ति की चमक हमेशा बरकरार रहती थी।
देश की सेवा में उनका योगदान सीमाओं तक सीमित नहीं रहा—मित्र राष्ट्रों के साथ हुए महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय अभियानों में भी उन्होंने देश का नाम गौरवान्वित किया।

अपनी मिट्टी—अपने बाँजबगड की ओर लौटने वाला विरला बेटा
रिटायरमेंट के बाद जब अधिकांश लोग शहरों में सुख-सुविधाओं की ओर बढ़ते हैं, कैप्टन मैंदोली ने रास्ता उल्टा चुना।
उन्होंने गांव बाँजबगड नहीं छोड़ा, बल्कि गांव की जान बचाने का संकल्प लिया।
बंजर पड़ी पुरखों की जमीन को उन्होंने फिर से हरा-भरा किया।
हल पकड़ते हुए जो गर्व उनके चेहरे पर दिखता था, वह किसी मेडल से कम नहीं था।
उनका विश्वास था—
“गांव तभी बचेगा, जब जमीन जगेगी।”
और वे इस विश्वास को जीवन के अंतिम क्षण तक जीते रहे।
नन्दा नगर की घाटी में, उनके हाथों से दोबारा जगे खेत आज भी उनकी सादगी और परिश्रम की कहानी कहते हैं।

हंसमुख स्वभाव—हर मिलन को यादगार बना देने वाला व्यक्तित्व
उनका स्वभाव विंदास, मजाकिया और बेहद आत्मीय था।
किसी भी व्यक्ति से मिलते तो दो ही मिनट में उसे अपना बना लेते।
उनकी हँसी में एक अपनापन था, और उनकी बातों में ऐसी सरलता थी जो पूरे नन्दा नगर क्षेत्र में उन्हें सबसे प्रिय बना देती थी।
वे जहां जाते, माहौल हल्का हो जाता, लोग मुस्कुराने लगते—जैसे उनकी उपस्थिति ही ऊर्जा बनकर फैल जाती हो।

दुर्घटना ने छीन लिया एक नेक इंसान, एक सच्चा सैनिक
एक अचानक आई दुर्घटना… और बाँजबगड का वह धुरंधर बेटा हमेशा के लिए खामोश हो गया।
दर्द सिर्फ इस बात का नहीं कि वे चले गए—दर्द इस बात का है कि वे बहुत कुछ जीते–जीते भी अपूर्ण छोड़ गए।
शनिवार को पैतृक घाट पर जब उनका अंतिम संस्कार हुआ, तो संपूर्ण नन्दा नगर क्षेत्र, रिश्तेदारों और परिचितों की आंखें नम थीं—पर हर दिल भरा हुआ था गर्व से, सम्मान से और यादों से।

स्मृतियाँ—जो कभी धुंधली नहीं होंगी
कैप्टन मैंदोली भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, पर उनकी हँसी की गूंज, उनके कर्मों की खुशबू और उनकी अपनी मिट्टी—बाँजबगड—के प्रति निष्ठा हमेशा जिंदा रहेगी।
उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि—

  • साहस युद्धभूमि से भी बड़ा होता है,
  • सेवा वर्दी के उतरने से भी जारी रहती है,
  • और सादगी ही मनुष्य को महान बनाती है।

आज हम उन्हें नम आँखों से विदाई देते हैं,
पर दिल में यह संकल्प लेकर—
कि उनकी सोच, उनके आदर्श और उनकी मुस्कान हमेशा हमारे साथ रहेंगे।

कैप्टन (रि.) दामोदर प्रसाद मैंदोली—आप सिर्फ स्मृतियों में नहीं,
हमारी प्रेरणा में हमेशा जीवित रहेंगे।

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