जब किसी गाँव की पगडंडियों पर एक बार फिर जीवन की आहट सुनाई देने लगे, जब सूने आँगनों में बच्चों की हँसी गूंजने लगे, और जब खेतों में फिर से हल चलने लगे तो समझ लीजिएगा,अब  रिवर्स पलायन की शुरुआत हो चुकी है। यह सिर्फ लौटना नहीं है, यह अपने जड़ों से जुड़ने की एक सशक्त और भावनात्मक यात्रा है।

उत्तराखंड के प्रवासी महेंद्र सिंह नेगी द्वारा पौड़ी के पोखड़ा ब्लॉक के गांवों—हड़कोट तल्ला, मल्ला और संगलाकोटी को गोद लेना इस बात का उदाहरण है कि जब मन में गाँव के प्रति प्रेम हो, तो कोई भी दूरी मायने नहीं रखती। संगलाकोटी में लगे शिविर में स्वास्थ्य परीक्षण से लेकर सरकारी योजनाओं की जानकारी तक, हर पहल ने यह जताया कि अब गाँव को पीछे नहीं छोड़ना, बल्कि साथ लेकर चलना है।

महेंद्र सिंह नेगी जैसे प्रवासी उत्तराखंडी उस भावना के प्रतीक हैं जो यह मानते हैं कि गाँव केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि हमारी आत्मा की आवाज़ हैं। वे जानते हैं कि अगर हमें भविष्य को मजबूत बनाना है, तो अतीत की जड़ों को सींचना होगा। उनका यह प्रयास न सिर्फ बुनियादी सुविधाएं गाँव तक पहुंचाने का है, बल्कि उन दिलों तक पहुंचने का है जो वर्षों से शहरों की चकाचौंध में खोकर  अपने गाँव की मिट्टी को तरसते रहे।

जब कोई प्रवासी अपने गाँव लौटता है, तो वह सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि उन सैकड़ों लोगों के लिए उम्मीद की नई किरण के साथ  सुबह लेकर आता है जो अब भी पलायन को मजबूरी समझते हैं। रिवर्स पलायन एक  सस्क्तआंदोलन बन   सकता है, बशर्ते उसमें दिल की सच्चाई, नीयत की पवित्रता और सहयोग की भावना हो।

गाँवों को फिर से बसाना, उन्हें विकास की मुख्यधारा में लाना, और वहाँ के लोगों को आत्मनिर्भर बनाना—यह कोई आसान राह नहीं है, लेकिन जब राह प्रेम से भरी हो, तो हर कदम मंज़िल की ओर बढ़ताहि है।

शायद अब समय आ गया है कि हम भी अपने गाँवों की ओर देखें, न सिर्फ यादों में, बल्कि अपने कर्मों में भी। क्योंकि असली विकास वहीं है, जहाँ से हमारी कहानी शुरू हुई थी।

गाँव  ताके  तुमहारी राह क्या आप जा रहे हैं 

बुलाते आंगन खेत खालियान क्या आप सुन रहे हैं?

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