उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित घाट विकासखंड का एक विशेष गाँव है बैरास कुण्ड। यह स्थान न केवल प्राकृतिक सौंदर्य और पर्वतीय शांति से भरपूर है, बल्कि भगवान शिव और रावण की अद्भुत कथा से भी जुड़ा हुआ है। यहाँ स्थित बैरास कुण्ड मंदिर को वशिष्ठठेश्वर के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर की स्थापना और उससे जुड़ी कथा एक गहन आध्यात्मिक रहस्य को प्रकट करती है  जहाँ भक्ति, माया और तपस्या का त्रिवेणी संगम होता है।

कहा जाता है कि एक बार रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए वर्षों तक कठोर तप किया। भगवान शिव उसकी भक्ति से प्रसन्न हुए और प्रकट होकर उसे वरदान मांगने को कहा। इस पर रावण ने कहा हे प्रभु  मैं चाहता हूँ कि आप मेरे महल लंका में निवास करें।

भगवान शिव मुस्कुराए और बोले तथास्तु, परंतु एक शर्त है  तुम मेरे इस शिवलिंग को अपने साथ लंका ले जाओ, लेकिन ध्यान रखना, रास्ते में इसे कभी भी ज़मीन पर नहीं रखना, और कहीं रुके बिना सीधे लंका पहुँचना। यदि तुम ऐसा कर सको तो मैं सदैव तुम्हारे महल में निवास करूंगा।”

रावण यह शर्त मान गया और शिवलिंग को उठाकर लंका की ओर चल पड़ा। परंतु शिव की माया प्रारंभ हो चुकी थी। यात्रा के दौरान रावण को चमोली जिले के घाट ब्लॉक में स्थित बैरास कुण्ड नामक स्थान पर लघु शंका की आवश्यकता पड़ी। उसने एक स्थानीय गडरिए (बकरी चराने वाला) जिसे वहाँ की भाषा में “पाल्सी” या “अन्वाल” कहा जाता है, को शिवलिंग थमाते हुए कहा इसे ज़मीन पर मत रखना, मैं बस अभी लौटता हूँ।

पाल्सी ने हाँ तो कर दी, पर शिव की लीला से प्रेरित होकर, जैसे ही रावण गया, उसने शिवलिंग को ज़मीन पर रख दिया और गायब हो गया। जब रावण लौटा तो देखा कि शिवलिंग भूमि पर स्थिर हो चुका है। उसने प्रयास किया कि शिवलिंग को फिर से उठा सके, पर वह अडिग हो चुका था। क्रोधित और दुखी रावण को यह समझ आ गया कि यह शिव की माया थी।

अपनी भूल का पश्चाताप करते हुए रावण ने वहीं बैरास कुण्ड में फिर से दस वर्षों तक कठोर तप किया। इस तपस्या की पराकाष्ठा में उसने अपने दसों सिर भगवान शिव को अर्पित कर दिए। उसकी यह परम भक्ति देखकर भगवान शिव पुनः प्रकट हुए और उसे शक्तिशाली होने का आशीर्वाद दिया।

यह मंदिर रावण की शिवभक्ति का प्रतीक माना जाता है।

यहाँ शिवलिंग आज भी उसी स्थान पर स्थित है जहाँ रावण द्वारा छोड़े जाने के बाद वह स्वतः स्थापित हो गया था।

मंदिर को वशिष्ठठेश्वर भी कहा जाता है क्योंकि मान्यता है कि महर्षि वशिष्ठ ने भी यहाँ आकर तप किया था।

यहाँ का जलकुण्ड, जिसे बैरास कुण्ड कहते हैं, आज भी पवित्र माना जाता है और स्थानीय लोग मानते हैं कि इसमें स्नान करने से पापों का नाश और मनोकामनाओं की पूर्ति होती है।

आज भी ग्रामीण पाल्सी/अन्वाल के रूप में उस चरवाहे की वंश परंपरा को याद करते हैं।

कहा जाता है कि कुछ रात्रियों में मंदिर के आस-पास घंटियों की ध्वनि, धूप-दीप की सुगंध और रुद्राभिषेक की गूँज सुनी जाती है।

श्रावण मास, माघ मास, महाशिवरात्रि, और नवरात्रि में यहाँ विशेष पूजा, रुद्राभिषेक, और भंडारे होते हैं।

बैरास कुण्ड की कथा यह सिखाती है कि सच्ची भक्ति चाहे राक्षस रूपी रावण की ही क्यों न हो, यदि उसमें समर्पण और निष्ठा हो तो भगवान शिव स्वयं प्रकट होकर कृपा करते हैं। साथ ही यह कथा यह भी दर्शाती है कि ईश्वर की माया से कोई भी नहीं बच सकता  चाहे वह कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो।

बैरास कुण्ड मंदिर एक ऐसी जगह है जहाँ पौराणिक इतिहास, लोकआस्था और प्रकृति एक साथ मिलते हैं। यह स्थल उत्तराखंड की विरासत, भक्ति की चरम सीमा, और शिव की करुणा का अद्भुत प्रतीक है।

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