उत्तराखंड की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत में टिहरी राज्य का विशेष स्थान रहा है। इसी के तहत परंपरा का एक अनुपम उदाहरण है “गाडू घड़ा तेल कलश” अनुष्ठान, जो टिहरी महाराज के निर्देश पर प्रतिवर्ष श्री बद्रीनाथ भगवान के कपाट खुलने से पूर्व संपन्न होता है 

उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहरों में तेल कलश यात्रा एक विशिष्ट धार्मिक परंपरा है, जो टिहरी नरेश की ओर से भगवान बद्रीविशाल के अभिषेक के पश्चात् लेपन हेतु प्रतिवर्ष संपन्न होती है। इस यात्रा की शुरू वात टिहरी राजदरबार से होती है, जहाँ नौटियाल ब्राह्मण जो टिहरी नरेश के राजगुरु होते हैं एक विधिपूर्वक पूजा-अनुष्ठान करते हैं। इस पूजा के माध्यम से तेल कलश को आध्यात्मिक शक्ति और आशीर्वाद प्रदान किया जाता है।

पूजा के पश्चात, इस यात्रा की बागडोर डिमरी समुदाय के ब्राह्मणों को सौंपी जाती है। बद्रीनाथ धाम की पूजा-पद्धति में विशेष भूमिका निभाने वाले ये ब्राह्मण, कलश को लेकर विभिन्न धार्मिक पड़ावों से होते हुए बद्रीधाम तक पहुँचाते हैं। यह यात्रा गहन श्रद्धा, परंपरा और अनुशासन का प्रतीक मानी जाती है।

कलश में भरा यह तिल का तेल, टिहरी राज्य की महारानी और महिलाओं द्वारा निकाला गया होता है, जो कपाट खुलने से बंद होने तक प्रतिदिन भगवान बद्रीविशाल के लेपन  में प्रयोग किया जाता है।

इस आयोजन की शुरुआत टिहरी राजदरबार में होती है, जहाँ महारानी टिहरी के नेतृत्व में पिले वस्त्र धारण कर सुहागिन महिलाएं और कुंवारी कन्याएं पवित्र तिलों से तेल निकालने की प्रक्रिया में भाग लेती हैं। इस तेल को ‘गाडू घड़ा’ (विशेष पात्र) में एकत्र किया जाता है। यह कार्य न केवल धार्मिक रूप से अत्यंत पवित्र माना जाता है, बल्कि इसमें भाग लेने वाली महिलाएं इसे पुण्य का कार्य समझती हैं।

यह परंपरा टिहरी राज्य के शासनकाल में प्रारंभ हुई, और माना जाता है कि इसकी शुरुआत स्वयं टिहरी महाराज ने की थी। हालांकि, सटीक वर्ष या कालखंड का उल्लेख स्पष्ट ऐतिहासिक अभिलेखों में दुर्लभ है, परन्तु जनश्रुतियों और लोककथाओं के अनुसार यह परंपरा 19वीं शताब्दी के आरंभ से चली आ रही है। टिहरी राज्य के धार्मिक कर्तव्यों में बद्रीनाथ यात्रा, देवस्थलों की सेवा, और तील तेल अभिषेक जैसी व्यवस्थाएँ प्रमुख थीं सायद इसी लिए टिहरी नरेश को बोलंदा बद्री भी कहा जाता है अथार्थ बोलने वाले बद्रीनाथ ।

तेल कलश का यह आयोजन न केवल धार्मिक श्रद्धा का प्रतीक है, बल्कि यह टिहरी राज्य की महिलाओं की सामूहिक आस्था, परंपरा और धार्मिक भागीदारी को भी दर्शाता है। तेल निकालने की प्रक्रिया में उत्सव, गीत-संगीत और एक विशिष्ट लोक वातावरण होता है, जो इस परंपरा को जीवंत और विशिष्ट बनाता है। इस परंपरा में राजदरबार, ब्राह्मण परंपरा और जनसामान्य की आस्था का त्रिवेणी संगम देखने को मिलता है, जो उत्तराखंड की सांस्कृतिक आत्मा को जीवित रखे हुए है।

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