
उत्तराखंड के चमोली जिले के सलूड़-डुंग्रा गांव में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला रम्माण महोत्सव न केवल स्थानीय आस्था और संस्कृति का प्रतीक है, बल्कि यह विश्व सांस्कृतिक मंच पर भी अपनी विशिष्ट पहचान बना चुका है। यूनेस्को द्वारा 2009 में इसे विश्व सांस्कृतिक धरोहर घोषित किया गया, जो इस उत्सव की ऐतिहासिकता, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक समृद्धि का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
पौराणिकता और परंपरा का संगम
रम्माण कोई साधारण मेला नहीं, बल्कि यह लोक-परंपरा, धर्म, समाज और संस्कृति का जीवंत उत्सव है। इस उत्सव की जड़ें पाँच सौ वर्षों से भी अधिक पुरानी मानी जाती हैं। यह भूमियाल देवता की वार्षिक पूजा का प्रमुख अवसर होता है जिसमें रामायण आधारित मंचन, ढोल-दमाऊ की थापों पर मुखौटा नृत्य, जागर, और लोकगाथाएँ प्रस्तुत की जाती हैं। राम जन्म, सीता स्वयंवर, वनवास, सीता हरण, लंका दहन जैसे प्रसंगों का जीवंत मंचन लोगों के हृदय में धार्मिक चेतना का संचार करता है।
मुखौटा नृत्य, जिसमें मोर-मोरनी, बण्या-बणियांण, ख्यालरी और कुरजोगी जैसे चरित्रों की झलक मिलती है, दर्शकों को मनोरंजन के साथ परंपरा से भी जोड़ता है।
शंकराचार्य की ऐतिहासिक उपस्थिति
30 अप्रैल 2025 को वैशाख शुक्ल तृतीया के दिन इस महोत्सव की ऐतिहासिक गरिमा और भी बढ़ गई, जब ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ‘१००८’ जी महाराज पहली बार रम्माण महोत्सव में सम्मिलित हुए। ज्ञात इतिहास में यह पहला अवसर था जब किसी शंकराचार्य ने इस उत्सव में सहभागिता की। ग्रामवासियों ने इसे शुभ संकेत मानते हुए आशीर्वचनों को ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में स्वीकारा।
शंकराचार्य जी ने अपने संबोधन में कहा, “रामावतार वेदों में बताए धर्म को जीवन में उतारने का आदर्श उदाहरण है और रम्माण महोत्सव उसी चरित्र का जीवंत प्रदर्शन है।” उन्होंने यह भी घोषणा की कि जैसे पहले ज्योतिर्मठ इस परंपरा में सहभागी था, अब भी यह परंपरा जारी रहेगी और मठ इस सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने हेतु प्रतिबद्ध रहेगा।
धर्म, समाज और चेतना का संगम
ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, आदि शंकराचार्य ने जब सनातन धर्म की पुनर्स्थापना हेतु चार पीठों की स्थापना की, तब उनके शिष्यों ने लोक में चेतना जगाने हेतु पौराणिक मुखौटों और नृत्य के माध्यम से गांव-गांव में प्रचार किया। यह रिवाज अब रम्माण का अभिन्न अंग बन चुका है। यही कारण है कि रम्माण न केवल धार्मिक आयोजन है, बल्कि यह समाज को एक सूत्र में बाँधने वाला, विचारों को जाग्रत करने वाला और सांस्कृतिक चेतना को जीवित रखने वाला पर्व है।
सांस्कृतिक गरिमा में साहित्यिक साक्षात्कार
इस अवसर पर पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ द्वारा लिखित पुस्तक रम्माण का लोकार्पण भी शंकराचार्य जी के करकमलों से सम्पन्न हुआ। यह पुस्तक रम्माण की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और सामाजिक परतों को खोलती है।
समारोह की गरिमामयी उपस्थिति
इस भव्य आयोजन में शंकराचार्य जी के साथ-साथ कई गणमान्य व्यक्तित्व उपस्थित रहे, जिनमें ज्योतिष्पीठ के विद्वान, प्रशासनिक अधिकारी, विधायक लखपत सिंह बुटोला, नगर पालिका अध्यक्ष देवेश्वरी शाह, लेखक व समाजसेवी शामिल रहे। सभा का संचालन कुशल भंडारी ने किया।
निष्कर्ष
रम्माण महोत्सव केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि वह जीवित चेतना है जो वेद, धर्म, लोक और संस्कृति को जन-जन के हृदय में जीवंत बनाए रखती है। यह पर्व शुद्ध आस्था, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक बन चुका है, और शंकराचार्य जी की उपस्थिति ने इसे और भी ऐतिहासिक बना दिया है। भविष्य में इस धरोहर को संरक्षित और प्रसारित करना हम सबका सामूहिक दायित्व है।




