
कुँवर प्रसून न केवल एक प्रखर पत्रकार थे, बल्कि उत्तराखंड के पर्यावरण, समाज और संस्कृति के लिए एक समर्पित योद्धा भी थे। उनकी लेखनी में जहाँ आम जनता की पीड़ा थी, वहीं उनकी आवाज़ में सत्ता से सवाल करने की ताकत भी थी। वे पहाड़ की आत्मा थे — जिनका जीवन संघर्ष, विचार और समाज के प्रति समर्पण की मिसाल रहा।
प्रारंभिक जीवन
कुँवर प्रसून का जन्म टिहरी गढ़वाल (वर्तमान उत्तराखंड) के एक सामान्य परिवार में 8 मई 1950 को हुआ। बचपन से ही उन्होंने प्रकृति से गहरा रिश्ता महसूस किया और यहीं से उनकी चेतना का बीज पड़ा। शिक्षा के दौरान ही उन्होंने साहित्य, पत्रकारिता और सामाजिक विषयों में रुचि लेनी शुरू कर दी।
पत्रकारिता: जनपक्षधर लेखनी की मिसाल
कुँवर प्रसून ने पत्रकारिता को सिर्फ पेशा नहीं, बल्कि जनसेवा का माध्यम माना। उनकी लेखनी पहाड़ की आवाज़ थी — उन्होंने “उत्तरांचल दीप”, “दैनिक जागरण”, और “गढ़वाली पत्रिकाओं” के माध्यम से उन मुद्दों को उठाया, जो मुख्यधारा की मीडिया में अनदेखे रह जाते थे।
उन्होंने विस्थापन, बाँध निर्माण, महिला अधिकारों और भ्रष्टाचार के खिलाफ बेबाकी से लिखा।
टिहरी बाँध आंदोलन में उनकी भूमिका विशेष रूप से याद की जाती है, जहाँ उन्होंने न केवल लेखन से, बल्कि मैदान में उतरकर संघर्ष किया।
पर्यावरण आंदोलन और सामाजिक चेतना
कुँवर प्रसून का जीवन चिपको आंदोलन की भावना से गहराई से जुड़ा रहा। उन्होंने हिमालयी पर्यावरण के संरक्षण, नदियों की अविरलता, और जैव विविधता की रक्षा के लिए आवाज़ उठाई।
भागीरथी बचाओ आंदोलन में उन्होंने सक्रिय भागीदारी निभाई।
“पहाड़ों को बचाने के लिए पहाड़ी सोच चाहिए” — यह उनका स्थायी मंत्र था।
उन्होंने सस्ती लोकप्रियता के लिए आंदोलनों का सहारा नहीं लिया, बल्कि अपने सादगीपूर्ण जीवन और ईमानदार सोच से जनजागरण किया।
व्यक्तित्व और दर्शन
कुँवर प्रसून एक सादा जीवन जीने वाले चिंतक थे। उनका पूरा जीवन जनमुक्ति, प्रकृति संरक्षण और आत्मनिर्भर समाज की कल्पना के लिए समर्पित था।
उन्होंने कभी सत्ता का लोभ नहीं किया।
वे आजीवन सत्य, साहस और सरलता के मार्ग पर चले।
कुँवर प्रसून आज भले ही हमारे बीच न हों, लेकिन उनकी विचारधारा आज भी उत्तराखंड के जनआंदोलनों में जीवित है। वे उन गिने-चुने पत्रकारों में थे जिन्होंने अपने जीवन से साबित किया कि कलम और विचार अगर सच्चे हों, तो वे पहाड़ की चट्टानों से भी टकरा सकते हैं।
उनकी स्मृति में कई शोधार्थी आज उनके जीवन और कार्यों पर अध्ययन कर रहे हैं, और कई जनपहलियाँ उनके नाम को सम्मानपूर्वक आगे बढ़ा रही हैं।
कुँवर प्रसून एक व्यक्ति नहीं, एक विचारधारा थे — जो उत्तराखंड के भविष्य को लेकर सजग, सतर्क और सजीव थी। उन्होंने हमें सिखाया कि पत्रकारिता केवल खबरें लिखना नहीं, बल्कि समाज के लिए जीना भी होता है। वे हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा हैं जो समाज को बदलने की चाह रखता है। अंत मै यही की कुँवर प्रसून अभाव मै हि जिये और अपनी पत्रकारिता और आन्दोलन लगातार जारी रखा और अन्ततः वे काल के आगे हारमान होगये और 18 जुलाई 2006 को अपने क्षेत्र मै हिरे की तरह अलग हि चमकने वाले नक्षत्र दुनियाँ को अलविदा कह गये।


