उत्तराखण्ड के चमोली जनपद के जोशीमठ विकासखंड, जिसे लोकपरंपरा में पैनखंडा कहा जाता है, में हरेला पर्व से लेकर घी संक्रांति (ओलगिया) तक पूरे सावन मास में मनाया जाने वाला पत्युड़ा उत्सव केवल एक खान-पान की परंपरा नहीं, बल्कि प्रकृति, कृषि, लोकआस्था और सामुदायिक जीवन का जीवंत उत्सव है। यह पर्व आज भी अनेक गाँवों में उसी आत्मीयता से मनाया जाता है, जैसे कभी हमारे पूर्वज मनाते थे।

पत्युड़ा कैसे बनता है?

पत्युड़ा बनाने की शुरुआत खेतों से होती है। सबसे पहले ताज़े अरबी और चौलाई के कोमल पत्ते सावधानी से तोड़े जाते हैं। इन्हें स्वच्छ पानी से अच्छी तरह धोया जाता है ताकि मिट्टी और धूल पूरी तरह निकल जाए।

इसके बाद एक बड़े बर्तन में गेहूँ के आटे में लाल मिर्च, हल्दी, नमक और अन्य स्थानीय मसाले मिलाकर गाढ़ा घोल तैयार किया जाता है। यही पारंपरिक विधि मानी जाती रही है। फिर प्रत्येक पत्ते को इस घोल में अच्छी तरह लपेटकर मोड़ा जाता है।

अब एक बड़े पतीले में नीचे थोड़ा पानी डाला जाता है। पानी के ऊपर लकड़ी की पतली सलाखों या जाली जैसी परत बिछाई जाती है, ताकि पत्ते सीधे पानी के संपर्क में न आएँ। उसके ऊपर घोल में लिपटे पत्ते करीने से रखे जाते हैं। फिर लकड़ी की दूसरी परत, उसके ऊपर फिर पत्ते—इस प्रकार चार या पाँच परतें लगाई जाती हैं।

अंत में पतीले को ढककर आग पर रखा जाता है। लगभग एक घंटे तक भाप में पकने के बाद पत्युड़े तैयार हो जाते हैं। ठंडा होने पर इन्हें काटकर जख्या के सुगंधित छौंक के साथ परोसा जाता है। जख्या की महक और अरबी-चौलाई के पत्तों का स्वाद मिलकर ऐसा पारंपरिक व्यंजन तैयार करते हैं, जिसका स्वाद केवल भोजन नहीं, बल्कि पूरे पैनखंडा की सांस्कृतिक स्मृति का अनुभव कराता है।

बदलता समय, बदलती रसोई

जोशीमठ के रविग्राम निवासी लगभग 90 वर्षीय श्री किशन सिंह भुजवाण इस परंपरा को याद करते हुए कहते हैं—

“जब हम छोटे थे, तब हमारे दादा इस त्योहार को बड़े उत्साह से मनाते थे। हम बच्चों को पूरे साल पत्युड़ा बनने का इंतज़ार रहता था।”

वे बताते हैं कि पहले पत्युड़े गेहूँ के आटे से बनाए जाते थे। बाद में धीरे-धीरे कई घरों में बेसन का उपयोग बढ़ने लगा। उनके अनुसार—

“परंपरा का स्वाद उसी में है, जिस रूप में हमारे पूर्वजों ने उसे हमें सौंपा। नई चीज़ें अपनाना बुरा नहीं, लेकिन पुरानी विधि को भी जीवित रखना चाहिए, ताकि असली जायका और विरासत दोनों सुरक्षित रहें।”

यह विचार केवल स्वाद की बात नहीं करता, बल्कि सांस्कृतिक संरक्षण का संदेश भी देता है।

लोकआस्था का आयाम

पत्युड़ा उत्सव हरेला के साथ शुरू होता है। हरेला उत्तराखण्ड में हरियाली, नई फसल और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का पर्व है। इसी संदर्भ में पत्युड़ा भी हरियाली का उत्सव माना जाता है। अरबी और चौलाई के हरे पत्तों का उपयोग केवल सुविधा नहीं, बल्कि प्रकृति की नई सृष्टि का सम्मान भी माना जाता है।

यद्यपि पत्युड़ा उत्सव का किसी प्राचीन धार्मिक ग्रंथ में स्पष्ट उल्लेख उपलब्ध नहीं है, फिर भी स्थानीय लोकमान्यताओं में इसे वर्षा ऋतु, समृद्धि और धरती माता के प्रति आभार व्यक्त करने वाली परंपरा के रूप में देखा जाता है। हिमालयी समाज में भोजन और पूजा का गहरा संबंध रहा है, इसलिए ऐसे व्यंजन भी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व प्राप्त कर लेते हैं।

वैज्ञानिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण

यदि वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो यह परंपरा अनेक कारणों से उल्लेखनीय है।

वर्षा ऋतु में अरबी और चौलाई जैसी स्थानीय वनस्पतियाँ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होती हैं। चौलाई के पत्तों में आयरन, कैल्शियम, विटामिन A और C जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं, जबकि अरबी के पत्ते भी अनेक सूक्ष्म पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं। इन्हें भाप में पकाने की विधि अपेक्षाकृत कम तेल में भोजन तैयार करती है और पोषक तत्वों का अच्छा संरक्षण करती है।

इसी प्रकार जख्या का छौंक केवल स्वाद ही नहीं बढ़ाता, बल्कि पारंपरिक हिमालयी भोजन की विशिष्ट सुगंध और पहचान भी देता है।

हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी

आज जब आधुनिक खान-पान की आदतें तेजी से बदल रही हैं, तब पत्युड़ा जैसी लोकपरंपराएँ केवल रसोई की विधियाँ नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान हैं। यदि हम इन्हें भूल गए, तो केवल एक व्यंजन नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों का अनुभव, लोकज्ञान और प्रकृति के साथ उनका संबंध भी खो देंगे।

आवश्यकता इस बात की है कि पत्युड़ा उत्सव का दस्तावेज़ीकरण हो, इसकी पारंपरिक विधियों को सुरक्षित रखा जाए और नई पीढ़ी को यह बताया जाए कि यह केवल स्वाद का नहीं, बल्कि संस्कृति, प्रकृति और सामुदायिक जीवन का उत्सव है।

पत्युड़ा हमें सिखाता है कि परंपराएँ केवल इतिहास नहीं होतीं—वे भविष्य की भी धरोहर होती हैं। जिस दिन पैनखंडा के घरों में पत्युड़े बनना बंद हो जाएँगे, उस दिन हमारी लोकस्मृतियों का एक महत्वपूर्ण अध्याय भी मौन हो जाएगा। इसलिए इस परंपरा को जीवित रखना हम सभी की साझा जिम्मेदारी है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *