
कुरुड़ से होमकुंड तक आस्था, इतिहास और लोकस्मृति की वह अमर यात्रा, जिसे दुनिया के सांस्कृतिक मानचित्र पर दर्ज किया जाना चाहिए
यह केवल एक यात्रा नहीं… हिमालय की आत्मा का प्रवास है
हिमालय की ऊंची चोटियों पर जब बादल उतरते हैं, बुग्यालों में फूल खिलते हैं और ढोल-दमाऊं की थाप के साथ “जय मां नंदा” का उद्घोष गूंजता है, तब ऐसा लगता है मानो पूरा पहाड़ अपनी बेटी को विदा करने के लिए एकत्र हो गया हो।
यहां देवी केवल मंदिर में स्थापित कोई मूर्ति नहीं हैं।
वह बेटी हैं।
वह बहन हैं।
वह ध्याण हैं।
वह हिमालय की स्मृति हैं।
और वह उस पहाड़ की आत्मा हैं, जिसने सदियों से उन्हें अपनी गोद में पाला है।
इसी भाव को अपने भीतर समेटे मां नंदा की बड़ी जात 2026 में एक बार फिर कुरुड़ से कैलाश की ओर चली है। 5 सितंबर को सिद्धपीठ कुरुड़ से प्रारंभ हुई इस यात्रा में लगभग 296 किलोमीटर की कठिन हिमालयी पदयात्रा, अनेक आबादी और निर्जन पड़ाव तथा चौसिंग्या खाड़ू की अगुवाई शामिल है। 20 सितंबर को होमकुंड में मां नंदा की महापूजा और चौसिंग्या खाड़ू की कैलाश विदाई इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक क्षण है।
लेकिन सवाल केवल इतना नहीं है कि मां नंदा की यात्रा कितने किलोमीटर की है।
बड़ा सवाल यह है—
क्या हम उस परंपरा की गहराई को समझ पाए हैं, जिसे हमारे पूर्वजों ने सदियों से अपने रक्त, विश्वास और लोकस्मृति में जीवित रखा?
कुरुड़ : जहां से बेटी की विदाई का भाव और गहरा हो उठता है
नंदानगर की धरती पर स्थित श्री नंदादेवी राजराजेश्वरी सिद्धपीठ कुरुड़ इस पूरी परंपरा का अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र है।
कुरुड़ केवल एक गांव नहीं है।
यहां नंदा को राजराजेश्वरी के रूप में पूजा जाता है। कुरुड़ की नंदा परंपरा का उल्लेख आधुनिक शोध और ऐतिहासिक विवरणों में भी मिलता है। उपलब्ध विवरणों के अनुसार कुरुड़ की नंदा की डोलियां अलग-अलग दिशाओं में निकलती रही हैं और राजजात के समय उनकी डोलियों का अन्य नंदा परंपराओं से मिलन होता रहा है।
यही कारण है कि 2026 की बड़ी जात को केवल आज के आयोजन के रूप में देखना इस परंपरा की विशालता को छोटा कर देना होगा।
यह लोकस्मृति की वह नदी है, जिसका उद्गम दिखाई नहीं देता, लेकिन जिसकी धारा आज भी बह रही है।
पुराने दस्तावेज बोलते हैं—नंदा की कथा नई नहीं है
इस आलेख के साथ उपलब्ध कराए गए पुराने दस्तावेजों में से एक विशेष सामग्री अत्यंत महत्वपूर्ण है।
एक पुराने समाचार-पत्र में शीर्षक दिखाई देता है—

राजजात का मूल
यह अपने आप में इतिहास का एक महत्वपूर्ण संकेत है।
दस्तावेज में तत्कालीन समय में नंदा की बड़ी जात, उसके आयोजन, होमकुंड में पूजा और यात्रा की परंपरा को लेकर विमर्श दिखाई देता है। इसमें पर्यटन की दृष्टि से भी इस आयोजन के महत्व पर चर्चा की गई है तथा कुरुड़ और यात्रा की परंपरा से जुड़े अधिकार एवं व्यवस्थाओं को लेकर तत्कालीन मतभेदों का उल्लेख मिलता है।
इसका अर्थ यह है कि कुरुड़ और नंदा यात्रा का प्रश्न आज अचानक पैदा हुआ विवाद नहीं है।
दशकों पहले भी लोग पूछ रहे थे—
नंदा की जात का मूल क्या है?
यात्रा का वास्तविक सांस्कृतिक आधार क्या है?
कौन-सी परंपरा किस क्षेत्र से जुड़ी है?
और इस विरासत को किस रूप में संरक्षित किया जाना चाहिए?
यही प्रश्न आज भी हमारे सामने हैं।
इसलिए इन पुराने दस्तावेजों को केवल पुराना कागज समझकर संदूक में बंद कर देना उचित नहीं होगा।
ये हमारी सामूहिक सांस्कृतिक स्मृति के दस्तावेज हैं।
एक सदी पुराने हिमालयी विवरण में नंदा की जीवित परंपरा
आपके द्वारा उपलब्ध कराया गया अंग्रेजी ऐतिहासिक विवरण भी इस दृष्टि से असाधारण महत्व रखता है।
इस पुराने विवरण में नंदा को हिमालय की अत्यंत महत्वपूर्ण देवी के रूप में वर्णित किया गया है। इसमें नंदा को पार्वती से जोड़ा गया है और हिमालय के विभिन्न क्षेत्रों में उनके मंदिरों तथा लोकविश्वासों का उल्लेख मिलता है।
विवरण में कुरुड़ का भी उल्लेख आता है और नंदा उपासना को चांदपुर तथा आसपास के हिमालयी क्षेत्रों की धार्मिक परंपरा से जोड़ा गया है।
इसमें यह भी बताया गया है कि नंदा की यात्रा में देवताओं की डोलियां साथ चलती हैं और परंपरा देवी को हिमालय के ऊंचे क्षेत्रों तक ले जाने तथा अंततः उनके पवित्र गंतव्य की ओर विदाई से जुड़ी है।
इतिहास का यह पक्ष अत्यंत महत्वपूर्ण है।
क्योंकि इससे यह स्पष्ट होता है कि नंदा की परंपरा केवल आधुनिक धार्मिक आयोजन नहीं है।
यह एक जीवित हिमालयी सभ्यता की परंपरा है।
और यही वह बिंदु है, जहां नंदा जात को हमें केवल धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि Living Himalayan Cultural Heritage — जीवित हिमालयी सांस्कृतिक विरासत के रूप में देखना चाहिए।
पुराना Himalayan Gazetteer भी उन्नीसवीं सदी में हिमालय के गांवों, पत्तियों, परगनों, इतिहास, भूगोल और सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन का व्यापक दस्तावेजीकरण करता है।
नंदा : देवी से पहले एक बेटी
नंदा परंपरा का सबसे मार्मिक पक्ष है—
“बेटी की विदाई।”
उत्तराखंड के लोकमानस में नंदा केवल देवी नहीं हैं। वह मायके आने वाली बेटी हैं।
विवाह के बाद बेटी जिस प्रकार अपने मायके लौटती है, वैसे ही नंदा के आगमन की कल्पना की जाती है।
और फिर वह दिन आता है जब मायके वाले अपनी बेटी को उसके ससुराल भेजते हैं।
लेकिन इस बेटी का ससुराल किसी साधारण गांव में नहीं है।
उसका ससुराल कैलाश है।
वहां उसके पति भगवान शिव हैं।
इसलिए जब हजारों लोग नंदा की डोली के पीछे चलते हैं, तो वे केवल धार्मिक अनुष्ठान में भाग नहीं ले रहे होते—
वे अपनी बेटी की विदाई में शामिल होते हैं।
इसी भाव ने नंदा जात को उत्तराखंड की सबसे मार्मिक लोकपरंपराओं में स्थान दिया है। ऐतिहासिक विवरणों में भी नंदा की यात्रा को मायके से ससुराल कैलाश की ओर देवी की विदाई के प्रतीक के रूप में समझाया गया है।

चौसिंग्या खाड़ू : चार सींगों में छिपा एक रहस्य
नंदा बड़ी जात की सबसे अद्भुत परंपराओं में से एक है—
चौसिंग्या खाड़ू।
चार सींग वाला यह मेढ़ा केवल यात्रा का पशु नहीं माना जाता।
लोकविश्वास में यह मां नंदा का शुभदूत है।
यात्रा की कठिन राहों में यह आगे चलता है और अंततः होमकुंड में विशेष पूजा-अर्चना के बाद कैलाश की ओर विदा किया जाता है। 2026 की यात्रा में भी चौसिंग्या खाड़ू यात्रा का प्रमुख प्रतीक है और 20 सितंबर को होमकुंड में उसकी कैलाश विदाई निर्धारित है।
यह दृश्य दुनिया की किसी आधुनिक धार्मिक यात्रा से बिल्कुल अलग है।
एक ओर हजारों मनुष्य।
दूसरी ओर हिमालय की नीरवता।
सामने बर्फीली चोटियां।
और बीच में एक चार सींग वाला खाड़ू—
जिसकी पीठ पर मां के लिए अर्पित सामग्री—
और फिर…
मनुष्य लौट आते हैं, लेकिन वह अकेला कैलाश की ओर बढ़ता है।
इस दृश्य में जितना धर्म है, उतना ही दर्शन भी है।
वाण, लाटू, वेदनी और रूपकुंड : रास्ते नहीं, आस्था के अध्याय हैं
कुरुड़ से चलने वाली यह यात्रा केवल भौगोलिक दूरी तय नहीं करती।
हर पड़ाव अपनी एक कथा लेकर आता है।
रामणी में देव डोलियों और छंतोलियों का मिलन।
वाण में लाटू देवता की परंपरा।
गैरोली पाताल की कठिन राह।
वेदनी बुग्याल की विराट हरियाली।
बगुवावासा।
पातर नचौणियां।
कैलवा विनायक।
रूपकुंड।
ज्योंरागली।
शिलासमुद्र।
और फिर—
होमकुंड।

2026 के निर्धारित कार्यक्रम में 12 सितंबर को रामणी, 15 सितंबर को वाण, 18 सितंबर को वेदनी बुग्याल और 19 सितंबर को रूपकुंड-ज्योंरागली-शिलासमुद्र क्षेत्र से होते हुए 20 सितंबर को होमकुंड पहुंचने का कार्यक्रम है।
यह रास्ता केवल पहाड़ को पार नहीं करता।
यह मनुष्य को स्वयं के भीतर उतरने की यात्रा भी कराता है।
होमकुंड : जहां शब्द समाप्त हो जाते हैं
नंदा जात का चरम केवल ऊंचाई नहीं है।
वह होमकुंड का भाव है।
यहां पहुंचकर जैसे पूरी यात्रा एक मौन प्रार्थना में बदल जाती है।
ढोल-दमाऊं की आवाज पीछे छूट जाती है।
भीड़ पीछे छूट जाती है।
बाजार पीछे छूट जाते हैं।
मनुष्य और प्रकृति आमने-सामने खड़े होते हैं।
और यहीं मां नंदा की कैलाश विदाई का सबसे मार्मिक क्षण आता है।
मायके की बेटी अब अपने ससुराल जा रही है।
पीछे रह जाते हैं हजारों आंसू।
आगे है कैलाश।
और बीच में है हिमालय।
क्या 2026 की बड़ी जात हमें एक ऐतिहासिक प्रश्न भी दे रही है?
2026 में नंदा यात्रा को लेकर नौटी की मुख्य राजजात और कुरुड़ से आयोजित बड़ी जात के संबंध में अलग-अलग निर्णय सामने आए। राजजात समिति ने मुख्य राजजात को 2027 में करने का निर्णय बताया, जबकि कुरुड़ के हक-हकूकधारियों और आयोजन समिति ने 2026 में बड़ी जात निकालने का निर्णय लिया।
इस विषय को केवल विवाद के रूप में देखना उचित नहीं होगा।
बल्कि इसे एक अवसर की तरह देखना चाहिए।
क्यों न हम इतिहास को सामने रखकर इस पूरी परंपरा का गंभीर दस्तावेजीकरण करें?
कुरुड़ की परंपरा।
नौटी की परंपरा।
कंसुवा की परंपरा।
बधाण की परंपरा।
दशोली की परंपरा।
वाण और लाटू की परंपरा।
चौसिंग्या खाड़ू की परंपरा।
और होमकुंड की अंतिम विदाई।
इन सभी को एक साथ रखकर ही नंदा संस्कृति की पूरी तस्वीर सामने आएगी।

नंदा जात : उत्तराखंड की सीमा से कहीं बड़ी सांस्कृतिक विरासत
आज दुनिया में जब UNESCO की Intangible Cultural Heritage जैसी अवधारणाओं के माध्यम से मानव सभ्यता की अमूर्त परंपराओं को संरक्षित करने की बात होती है, तब हमारे सामने नंदा की जात जैसा जीवित उदाहरण है।
यहां—
लोकगीत हैं,
लोकनृत्य हैं,
देव डोलियां हैं,
छंतोलियां हैं,
स्थानीय वाद्य हैं,
लोककथाएं हैं,
स्त्रियों के मांगल गीत हैं,
पर्वतीय वास्तु और देवालय हैं,
पारंपरिक मार्ग हैं,
बुग्याल हैं,
हिमालयी जैव विविधता है,
और सबसे महत्वपूर्ण—पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित विश्वास है।
यह किसी संग्रहालय में बंद संस्कृति नहीं है।
यह आज भी चलती है।
हजारों कदमों के साथ चलती है।
ढोल की थाप पर चलती है।
मां की डोली के साथ चलती है।
और हिमालय की बर्फीली हवाओं में अपना इतिहास लिखती है।
अब दुनिया को केवल नंदा की यात्रा दिखानी नहीं, समझानी होगी
यदि नंदा बड़ी जात को वैश्विक पटल पर प्रतिष्ठित करना है तो केवल बड़े-बड़े दावे पर्याप्त नहीं होंगे।
हमें काम करना होगा—
1. पुराने दस्तावेजों का संरक्षण
कुरुड़, नौटी और अन्य क्षेत्रों में उपलब्ध पुराने पत्र, जात-पत्र, यात्रा कार्यक्रम, मंदिर अभिलेख, वंशावली और समाचार-पत्रों की कतरनों को डिजिटल रूप में सुरक्षित किया जाए।
2. एक “नंदा डिजिटल आर्काइव” बने
पुरानी तस्वीरें, गीत, मांगल, लोककथाएं, दस्तावेज और यात्रियों की स्मृतियां एक डिजिटल संग्रह में रखी जाएं।
3. नंदा जात का बहुभाषी दस्तावेज बने
हिंदी के साथ अंग्रेजी और अन्य प्रमुख भाषाओं में इसका प्रमाणिक इतिहास उपलब्ध हो।
4. पुराने स्रोतों पर शोध हो
Atkinson जैसे पुराने दस्तावेजों, स्थानीय इतिहासकारों, लोकसाहित्य और मंदिर अभिलेखों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाए।
5. कुरुड़ और अन्य केंद्रों की भूमिका का निष्पक्ष इतिहास लिखा जाए
किसी परंपरा को छोटा या बड़ा करने के बजाय प्रमाणों के आधार पर पूरी तस्वीर सामने रखी जाए।
और सबसे जरूरी—हिमालय को बचाना होगा
यदि हम मां नंदा को बेटी मानते हैं तो क्या हम उनके मायके को गंदा कर सकते हैं?
क्या उनकी राह में प्लास्टिक छोड़ सकते हैं?
क्या पवित्र जलस्रोतों को प्रदूषित कर सकते हैं?
क्या बुग्यालों पर कचरा फैला सकते हैं?
नहीं।
नंदा की जात का सबसे बड़ा संदेश केवल पूजा नहीं होना चाहिए।
प्रकृति की रक्षा भी पूजा होनी चाहिए।
हर यात्री अपने साथ अपना कचरा वापस लाए।
प्लास्टिक का उपयोग न्यूनतम हो।
जलस्रोतों को सुरक्षित रखा जाए।
बुग्यालों में अनावश्यक निर्माण और अतिक्रमण से बचा जाए।
स्थानीय वनस्पतियों और वन्यजीवन की रक्षा हो।
और यात्रा समाप्त होने के बाद भी मार्ग को उसी तरह छोड़ा जाए, जैसा मां नंदा के आने से पहले था।
क्योंकि
जिस हिमालय को हम मां नंदा का घर कहते हैं, उसकी रक्षा करना ही मां नंदा की सच्ची सेवा है।
ध्याणियां लौट आई हैं
इस बार नंदा की बड़ी जात में केवल श्रद्धालु नहीं आए।
धियाणियां आई हैं।
वे बेटियां जो विवाह के बाद दूर चली गईं।
प्रवासी लौटे हैं।
गांवों में फिर रौनक आई है।
पुराने आंगनों में फिर आवाजें सुनाई दी हैं।
किसी मां ने बेटी को वर्षों बाद देखा होगा।
किसी भाई ने बहन का माथा चूमा होगा।
किसी बूढ़े पिता ने अपने घर की चौखट पर बेटी के आने की प्रतीक्षा की होगी।
और इसीलिए नंदा जात को केवल धार्मिक यात्रा कहना शायद उसके सबसे बड़े मानवीय पक्ष को भूल जाना होगा।
यह पहाड़ के बिखरे परिवारों को फिर से जोड़ने वाली यात्रा भी है।
12 साल बाद जब नंदा आती हैं, तो पहाड़ भी जाग उठता है
नंदा की यात्रा का 12 वर्ष का अंतराल केवल धार्मिक गणना नहीं है।
यह प्रतीक्षा है।
एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को कहानी सुनाती है
जब पिछली बार मां आई थीं
फिर बच्चे बड़े होते हैं।
नई पीढ़ी आती है।
और एक दिन वही बच्चे अपनी संतानों को बताते हैं—
“चलो, मां नंदा की जात में चलते हैं।”
इस तरह एक परंपरा किताब से नहीं, मनुष्य से मनुष्य तक पहुंचती है।
यही किसी भी जीवित संस्कृति की सबसे बड़ी ताकत है।
अब समय है कि नंदा की जात को विश्व सांस्कृतिक विरासत की दृष्टि से देखा जाए
दुनिया ने हिमालय को उसकी चोटियों से जाना।
एवरेस्ट से जाना।
ग्लेशियरों से जाना।
योग और अध्यात्म से जाना।
लेकिन हिमालय की एक और पहचान है—
उसकी जीवित लोकसंस्कृति।
नंदा की जात उसी जीवित संस्कृति का विराट उदाहरण है।
यहां धर्म है लेकिन केवल धर्म नहीं।
इतिहास है लेकिन केवल इतिहास नहीं।
साहस है लेकिन केवल साहस नहीं।
प्रकृति है लेकिन केवल प्रकृति नहीं।
यह सब मिलकर एक ऐसी सांस्कृतिक धरोहर बनाते हैं, जिसे दुनिया के सामने पूरी प्रमाणिकता और गरिमा के साथ प्रस्तुत किया जाना चाहिए।

Nanda Jaat is not merely a pilgrimage.
It is a living memory of the Himalaya.
कुरुड़ से उठी डोली और दुनिया के लिए संदेश
आज जब मां नंदा की डोली कुरुड़ से कैलाश की ओर बढ़ रही है, तो उसके साथ केवल हजारों श्रद्धालुओं के कदम नहीं हैं।
उसके साथ चल रहा है—
हजारों वर्षों का लोकविश्वास।
चल रहे हैं हमारे पूर्वज।
चल रही हैं हमारी माताएं।
चल रही हैं हमारी ध्याणियां।
चल रहे हैं हमारे लोकगीत।
चल रहा है ढोल-दमाऊं।
चल रही है पहाड़ की भाषा।
चल रही है हमारी स्मृति।
और चल रहा है वह प्रश्न—
क्या हम इस विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक उसी पवित्रता से पहुंचा पाएंगे, जिस पवित्रता से यह हमें मिली है?
अंतिम शब्द : – मां की विदाई, हमारी जिम्मेदारी
20 सितंबर को जब होमकुंड की ऊंचाइयों पर मां नंदा की महापूजा होगी और चौसिंग्या खाड़ू को कैलाश की ओर विदा किया जाएगा, तब शायद वहां खड़े हजारों लोगों की आंखें नम होंगी।
मां मायके से विदा होंगी।
लेकिन मां की विदाई का अर्थ यह नहीं कि रिश्ता समाप्त हो गया।
बेटी मायके से जाती है, मायका उसके भीतर रहता है।
नंदा कैलाश जाएंगी
लेकिन उनका मायका कुरुड़, नंदानगर, चमोली, गढ़वाल और पूरा उत्तराखंड रहेगा।
उनकी स्मृति हमारे लोकगीतों में रहेगी।
उनकी डोली हमारी आंखों में रहेगी।
उनकी यात्रा हमारे इतिहास में रहेगी।
और उनकी राह
हमारी जिम्मेदारी रहेगी।
इसलिए आज आवश्यकता है कि नंदा की बड़ी जात को केवल एक धार्मिक आयोजन की तरह न देखा जाए।
इसे इतिहास, लोकसाहित्य, मानवशास्त्र, पर्यावरण, पर्वतीय जीवन और भारतीय सभ्यता की अमूल्य विरासत के रूप में दस्तावेजित किया जाए।
क्योंकि
कुछ यात्राएं मंजिल तक पहुंचने के लिए नहीं होतीं
वे आने वाली पीढ़ियों को यह बताने के लिए होती हैं कि हम कौन थे।
और मां नंदा की जात ऐसी ही एक यात्रा है।
कुरुड़ से होमकुंड तक यह केवल डोली नहीं चलती
पूरा हिमालय चलता है।
जय मां नंदा।
जय राजराजेश्वरी।
लेखक
इन्दर सिंह बिष्ट
हिमाल रैबार
यह लेख उपलब्ध पुराने दस्तावेजों, लोकपरंपराओं, ऐतिहासिक संदर्भों और 2026 की बड़ी जात से संबंधित समकालीन विवरणों को आधार बनाकर तैयार किया गया है। कुरुड़, नौटी तथा राजजात की ऐतिहासिक प्राथमिकता से जुड़े मतभेदों को शोध और प्रमाण के विषय के रूप में देखा जाना चाहिए, अंतिम ऐतिहासिक निष्कर्ष के रूप में नहीं।
