
एक माँ, दो यात्राएँ और सरकार से एक बड़ा सवाल—क्या नंदा के भक्तों में भी फर्क है?
2026 की बड़ी जात को सरकारी व्यवस्था से वंचित और 2027 की प्रस्तावित राजजात को विशेष सरकारी संरक्षण क्यों?
जय माँ नंदादेवी।
पहाड़ की बेटी माँ नंदा के प्रति उत्तराखंड के लोगों की आस्था किसी सीमा में बंधी नहीं है। माँ नंदा की डोली जब निकलती है तो यह केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं होती, बल्कि पूरा पहाड़ अपनी बेटी को मायके से ससुराल और फिर कैलाश की ओर विदा करता है।
लेकिन इस बार माँ नंदा की यात्रा को लेकर एक ऐसा सवाल खड़ा हो गया है, जिसका जवाब सरकार और शासन को देना ही होगा।
क्या माँ नंदा के भक्तों में भी सरकार ने दो हिस्से कर दिए हैं?
एक यात्रा 2026 में हो रही है और दूसरी यात्रा 2027 में प्रस्तावित है।
अगर दोनों यात्राएँ माँ नंदा की आस्था से जुड़ी हैं, तो फिर—
एक यात्रा के लिए सरकारी बजट, अधिकारी, योजनाएँ और व्यवस्थाएँ… और दूसरी यात्रा के लिए केवल जनता की आस्था और जनसहयोग?
क्या यह अंतर उचित है?
2026 की बड़ी जात क्या किसी की निजी यात्रा है?
5 सितंबर से सिद्धपीठ कुरुड़ से माँ नंदा की बड़ी जात शुरू होने जा रही है, जो 30 सितंबर तक चलेगी। आयोजन समिति के अनुसार इसमें 484 गांवों के श्रद्धालु शामिल होंगे। समिति ने रास्तों के सुधार और श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए जिलाधिकारी को ज्ञापन भी दिया है।
तो फिर सवाल यह है कि—
इन 484 गांवों के लोग किसके हैं?
क्या ये उत्तराखंड के नागरिक नहीं हैं?
क्या इन श्रद्धालुओं की सुरक्षा सरकार की जिम्मेदारी नहीं है?
क्या माँ नंदा की डोली के साथ चलने वाले हजारों श्रद्धालुओं के लिए सुरक्षित सड़क, पैदल मार्ग, पेयजल, चिकित्सा, शौचालय, यातायात और आपातकालीन व्यवस्था की जरूरत नहीं है?
यदि जरूरत है तो फिर व्यवस्था में यह अंतर क्यों दिखाई दे रहा है?

सरकार ने खुद 2026 की राजजात के लिए बड़े-बड़े निर्देश दिए थे
यह सवाल इसलिए और गंभीर हो जाता है क्योंकि सरकार की ओर से पहले 2026 में होने वाली नंदा देवी राजजात के लिए अधिकारियों को तैयारियाँ पूरी करने, पैदल मार्गों को व्यवस्थित करने, पड़ावों पर ठहरने, भोजन, स्नानघर, स्वास्थ्य सुविधाएँ, मेडिकल कैंप, हेली एम्बुलेंस, दूरसंचार, डिजिटल ट्रैकिंग और यातायात व्यवस्था तक के निर्देश दिए गए थे।
सरकार ने 2026-27 के बजट में नंदा देवी राजजात के लिए 25 करोड़ रुपये का प्रावधान भी बताया है।
फिर सवाल और सीधा हो जाता है—
यदि सरकार ने माँ नंदा की यात्रा के लिए बजट रखा था, तो 2026 की बड़ी जात के श्रद्धालुओं को उसका लाभ क्यों नहीं मिलना चाहिए?
क्या बजट केवल यात्रा के नाम का है?
या फिर वह माँ नंदा से जुड़े हर श्रद्धालु की सुरक्षा और सुविधा के लिए है?
2026 में बड़ी जात, 2027 में राजजात—तो सरकार किसके साथ है?
2026 की राजजात को स्थगित किए जाने के पीछे यात्रा के समय, मौसम, मलमास और यात्रा पड़ावों पर अधूरी ढांचागत सुविधाओं जैसे कारण बताए गए थे और 2027 में राजजात प्रस्तावित किए जाने की बात सामने आई।
दूसरी ओर कुरुड़ से 2026 में बड़ी जात आयोजित करने का निर्णय लिया गया।
यही वह बिंदु है जहाँ जनता के मन में सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है—
अगर 2027 की राजजात के लिए व्यवस्थाएँ जरूरी हैं, तो 2026 की बड़ी जात के श्रद्धालुओं के लिए वही व्यवस्थाएँ जरूरी क्यों नहीं हैं?
क्या 2027 में जाने वाला यात्री सरकार का नागरिक होगा और 2026 में माँ नंदा की बड़ी जात में जाने वाला यात्री केवल ग्रामीण समाज की जिम्मेदारी?
यह सवाल किसी एक समिति के पक्ष या विपक्ष में नहीं है।
यह सवाल बराबरी का है।

क्या सरकार अनजाने में भेदभाव तो नहीं कर रही?
सरकार से यह पूछना जरूरी है कि यदि 2027 की प्रस्तावित राजजात के लिए करोड़ों रुपये की योजनाएँ बन सकती हैं, विभागों की जिम्मेदारी तय हो सकती है, अधिकारियों की बैठकें हो सकती हैं और यात्रा को भव्य बनाने की योजना बन सकती है—
तो 2026 की बड़ी जात के लिए भी वही अधिकार क्यों नहीं?
क्या बड़ी जात में शामिल होने वाला श्रद्धालु कम महत्वपूर्ण है?
क्या उसकी जान की कीमत कम है?
क्या वह कम दूर से आएगा?
क्या उसे सड़क की जरूरत नहीं होगी?
क्या उसे चिकित्सा सुविधा नहीं चाहिए?
क्या उसे सुरक्षित पैदल मार्ग नहीं चाहिए?
क्या उसके लिए आपातकालीन सेवा की जरूरत नहीं है?
माँ नंदा के भक्त को यह जवाब कौन देगा?

नंदप्रयाग–नंदानगर सड़क पूछ रही है—मेरा क्या कसूर है?
आज नंदप्रयाग–नंदानगर डेढ़ लेन मोटर मार्ग की स्थिति को लेकर क्षेत्र की जनता चिंतित है।
बड़ी जात के दौरान इस मार्ग पर श्रद्धालुओं और वाहनों की आवाजाही बढ़ने वाली है।
ऐसे में सवाल केवल सड़क का नहीं है।
सवाल है—
क्या सरकार किसी दुर्घटना के बाद जागेगी?
क्षेत्र की जनता जान जोखिम में डालकर सफर करे और विभाग केवल फाइलों में काम करता रहे—यह स्वीकार नहीं किया जा सकता।
माननीय जिलाधिकारी चमोली से आग्रह नहीं, अब जनहित में अपेक्षा है कि इस सड़क का तत्काल स्थलीय निरीक्षण कराया जाए और निर्माणदायी संस्था की जवाबदेही तय की जाए।
जनता को यह भी बताया जाए कि सड़क कब तक सुरक्षित और यातायात के योग्य बनाई जाएगी।
पहले गाँव व्यवस्था करते थे, आज सरकार कहाँ है?
हमारे बुजुर्गों के समय माँ नंदा की जात निकलती थी तो गाँव अपने दरवाजे खोल देते थे।
कहीं अनाज मिलता था।
कहीं दाल।
कहीं घी।
कहीं पानी।
कहीं रहने की जगह।
कहीं श्रमदान।
और सबसे बड़ी बात—
हर गाँव कहता था—माँ मेरी बेटी है।
आज हमारे पास सड़क बनाने के लिए मशीनें हैं।
बजट है।
इंजीनियर हैं।
प्रशासन है।
विभाग हैं।
संचार व्यवस्था है।
फिर भी अगर माँ की डोली को सुरक्षित रास्ता नहीं दे पा रहे हैं तो हमें अपने विकास के दावों पर भी एक बार जरूर विचार करना चाहिए।
कुरुड़, कांसुवा और नौटी का सवाल नहीं—माँ नंदा का सवाल है
आज अलग-अलग समितियों और क्षेत्रों के बीच यात्रा के स्वरूप और आयोजन वर्ष को लेकर मतभेद सार्वजनिक चर्चा में हैं। कुरुड़ पक्ष 2026 की बड़ी जात पर कायम है, जबकि राजजात समिति की ओर से 2027 में यात्रा प्रस्तावित किए जाने की बात सामने आई है।
लेकिन इस मतभेद का खामियाजा श्रद्धालुओं को नहीं भुगतना चाहिए।
सरकार को किसी पक्ष का हिस्सा बनने के बजाय माँ नंदा के सभी भक्तों के साथ खड़ा होना चाहिए।
यदि 2026 में बड़ी जात निकल रही है तो उसे सुरक्षित और गरिमामय बनाना सरकार की जिम्मेदारी है।
यदि 2027 में राजजात होती है तो उसकी भी बेहतर व्यवस्था सरकार करे।
लेकिन दोनों के बीच भेद क्यों?
सरकार से पाँच सीधे सवाल
पहला— 2026 की बड़ी जात में शामिल होने वाले श्रद्धालुओं के लिए सरकार की आधिकारिक कार्ययोजना क्या है?
दूसरा— नंदप्रयाग–नंदानगर मार्ग सहित यात्रा से जुड़े रास्तों की सुरक्षा और सुधार के लिए कितना बजट और किस विभाग को दिया गया है?
तीसरा— 2027 की प्रस्तावित राजजात के लिए जो सरकारी बजट और व्यवस्थाएँ प्रस्तावित हैं, क्या उनका कोई हिस्सा 2026 की बड़ी जात के श्रद्धालुओं की सुरक्षा में लगाया जा रहा है?
चौथा— यदि नहीं, तो इसका कारण क्या है?
पाँचवाँ— क्या सरकार यह स्पष्ट करेगी कि 2026 की बड़ी जात और 2027 की प्रस्तावित राजजात में शामिल होने वाला प्रत्येक श्रद्धालु सरकार की नजर में समान है?
यह लड़ाई बजट की नहीं, सम्मान की है
हमें सरकार से माँगना चाहिए कि 2026 की बड़ी जात को केवल इसलिए सरकारी व्यवस्था से वंचित न किया जाए कि किसी दूसरी समिति ने राजजात को 2027 में कराने का निर्णय लिया है।
माँ एक है।
आस्था एक है।
श्रद्धालु एक हैं।
फिर व्यवस्था दो क्यों?
अगर 2027 की यात्रा के लिए सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर सकती है तो 2026 में माँ की डोली के साथ चलने वाले श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए भी सरकार को आगे आना चाहिए।
और यदि सरकार कहती है कि 2026 की बड़ी जात के लिए भी पर्याप्त व्यवस्था की जा रही है, तो उसे यह बात कागज पर नहीं, जमीन पर दिखानी होगी।
माँ नंदा किसी समिति की नहीं, पूरे पहाड़ की बेटी हैं
कुरुड़ हो या कांसुवा।
नौटी हो या नंदानगर।
बधाण हो या दशोली।
गढ़वाल हो या पूरा उत्तराखंड।
माँ नंदा सबकी हैं।
इसलिए माँ की यात्रा को लेकर किसी भी प्रकार का विवाद हो सकता है, लेकिन श्रद्धालुओं की सुरक्षा और सुविधा पर कोई समझौता नहीं होना चाहिए।
सरकार को चाहिए कि वह दोनों पक्षों को साथ बैठाए।
मतभेद दूर कराए।
यात्रा की गरिमा बनाए रखे।
और सबसे महत्वपूर्ण—
2026 की बड़ी जात को यह महसूस न होने दे कि वह सरकार की नजर में छोटी यात्रा है।
क्योंकि माँ नंदा की डोली छोटी-बड़ी नहीं होती।
भक्ति छोटी-बड़ी नहीं होती।
श्रद्धालु छोटा-बड़ा नहीं होता।
तो फिर सरकारी व्यवस्था छोटी-बड़ी क्यों हो?
अब फैसला सरकार को करना है
क्या 2026 की बड़ी जात में चलने वाला श्रद्धालु भी उतना ही सम्मान पाएगा, जितना 2027 की प्रस्तावित राजजात में चलने वाला?
क्या नंदा की डोली के आगे सड़क सुरक्षित होगी?
क्या निर्जन पड़ावों पर रोशनी, पानी, चिकित्सा और सुरक्षा होगी?
क्या निर्माणदायी संस्थाओं की जवाबदेही तय होगी?
और क्या सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि माँ नंदा की आस्था को किसी प्रशासनिक या संस्थागत मतभेद का शिकार न होना पड़े?
इन सवालों का जवाब अब जनता चाहती है।
माँ नंदा के नाम पर राजनीति नहीं—समान व्यवस्था चाहिए।
2026 की बड़ी जात हो या 2027 की राजजात—माँ के हर भक्त की जान और आस्था की कीमत बराबर होनी चाहिए।
क्योंकि—
**माँ नंदा एक हैं,
उनके भक्त एक हैं,
तो सरकारी व्यवस्था भी एक जैसी क्यों नहीं?**
जय माँ नंदा।
जय माँ नंदादेवी।
— इन्दर सिंह बिष्ट
हिमाल रैबार
