
उत्तराखण्ड—हिमालय की गोद में बसा एक नवयुवक राज्य है जिसकी स्थापना 9 नवम्बर 2000 को जनता के लंबे संघर्षों और सपनों के फलस्वरूप हुई थी। अब, 25 वर्षों का यह युवा राज्य अपने विकास की दिशा तय करने के बजाय पलायन जैसे गंभीर संकट से जूझ रहा है।
राज्य गठन के पीछे एक प्रमुख उद्देश्य था—स्थानीय जनता को उनके ही क्षेत्र में रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास की सुविधाएँ उपलब्ध कराना, ताकि उन्हें अपने गांव-घरों को छोड़कर मैदानों की ओर पलायन न करना पड़े। दुर्भाग्यवश, यह सपना आज भी अधूरा है।
पलायन का मुद्दा इतना गंभीर हो चला है कि सरकार को वर्ष 2017 में “पलायन आयोग” का गठन करना पड़ा, जिसका मुख्यालय पौड़ी में स्थापित किया गया। लेकिन आयोग की भूमिका अब तक मात्र आंकड़ों के संकलन और रिपोर्टों तक ही सीमित रही है। नीति निर्धारण और ज़मीनी क्रियान्वयन के स्तर पर इसका प्रभाव नगण्य है।

कोविड-19 वैश्विक महामारी के दौरान एक असामान्य परिदृश्य देखने को मिला—हजारों प्रवासी उत्तराखण्डवासी अपने मूल गांवों की ओर लौटे। यह एक स्वर्णिम अवसर था जब सरकार ठोस रणनीति बनाकर इन लोगों को स्थायी रूप से अपने गांवों में रोक सकती थी। लेकिन जैसे ही परिस्थितियाँ सामान्य हुईं, लोग पुनः रोज़गार की तलाश में मैदानों और महानगरों की ओर पलायन कर गए।
पलायन के मूल कारण आज भी वही हैं:
रोजगार के पर्याप्त साधनों का अभाव
प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं की दुर्गति
गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की अनुपलब्धता
बुनियादी ढाँचे का विकास न होना
इन समस्याओं को सुलझाने के लिए अगर कोई ठोस प्रयास हुआ है तो उसका लाभ ग्रामीण जनता तक नहीं पहुँच पाया है।
गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित करने का निर्णय एक साहसिक कदम था। लेकिन जब तक वहाँ नियमित विधानसभा सत्र नहीं होते, जब तक विधायकों को वहां ठहरने के लिए उचित सुविधाएँ नहीं मिलतीं, तब तक यह निर्णय भी केवल “प्रतीकात्मकता” तक सीमित रहेगा। पिछले वर्षों में गैरसैंण में तीन दिनों से अधिक का कोई सत्र आयोजित न होना यही दर्शाता है कि सरकार स्वयं भी पहाड़ चढ़ने को तैयार नहीं है—ऐसे में जनता को कौन प्रेरित करेगा?
उत्तराखण्ड को अब “देवभूमि” से “खाली गांवों की भूमि” बनने से रोकने के लिए नीतिगत बदलावों की आवश्यकता है।
स्थानीय कृषि, पर्यटन और हस्तशिल्प को बढ़ावा देना
ईको-टूरिज्म व होम-स्टे मॉडल को सरकारी संरक्षण देना
पहाड़ी क्षेत्रों में डिजिटल शिक्षा व टेलीमेडिसिन सुविधाएँ
सड़कों व इंटरनेट जैसी बुनियादी सेवाओं का विस्तार

जब तक राज्य सरकार और प्रशासनिक मशीनरी पहाड़ों को केवल ‘दर्शनीय स्थल’ नहीं, बल्कि ‘जीवंत और समर्थ जीवन स्थान’ मानकर काम नहीं करेगी, तब तक उत्तराखण्ड का पलायन संकट केवल आंकड़ों और घोषणाओं का विषय बना रहेगा और यह भी बताना जरूरी है उत्तराखण्ड के विकास की असली पहचान तभी संभव है जब राज्य की जड़ें—यानि उसके गांव—मजबूत हों। पलायन केवल एक आर्थिक या सामाजिक समस्या नहीं है, यह उत्तराखण्ड की संस्कृति, अस्तित्व और आत्मा का संकट बन चुका है। यदि सरकार, समाज और प्रशासन ने मिलकर ठोस और दृढ़ नीतियां नहीं अपनाईं, तो आने वाले समय में उत्तराखण्ड केवल एक भूगोलिक इकाई बनकर रह जाएगा—जहाँ गांवों में दरवाज़े बंद, रास्ते सूने और खेत बंजर मिलेंगे।
