राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर.एस.एस.) का नाम आते ही जो चित्र मन में उभरता है, वह है—खाकी गणवेश में अनुशासित पंक्ति में चलते हुए स्वयंसेवकों का। यह दृश्य केवल एक शोभायात्रा नहीं, बल्कि एक गहन उद्देश्य और दर्शन को प्रकट करता है। इस अनुशासित परंपरा को पथ संचलन कहा जाता है।

पथ संचलन का आरंभ

आर.एस.एस. की स्थापना 27 सितंबर 1925 को डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा नागपुर में हुई थी। प्रारंभिक वर्षों में संघ की गतिविधियाँ शाखाओं तक सीमित थीं। धीरे-धीरे स्वयंसेवकों की संख्या बढ़ी और 1930 के दशक में ‘पथ संचलन’ की परंपरा की शुरुआत हुई।

प्रथम पथ संचलन नागपुर में ही आयोजित हुआ, जिसमें केवल 40 से 50 स्वयंसेवक शामिल थे। परंतु यही छोटी शुरुआत आने वाले समय में एक विशाल राष्ट्रव्यापी परंपरा बन गई।

पथ संचलन का उद्देश्य

पथ संचलन केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि संगठन की आत्मा का दृश्य रूप है। इसका मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं:

स्वयंसेवकों में अनुशासन, संगठनात्मक समरसता और निष्ठा का विकास

समाज में राष्ट्रप्रेम, एकता और सामाजिक जागरूकता का प्रसार

संघ और समाज के बीच सजीव संवाद स्थापित करना

युवाओं में शक्ति, सेवा और संस्कार का संचार करना

पथ संचलन के लाभ

1. अनुशासन की शिक्षा: पथ संचलन स्वयंसेवकों में आत्मनियंत्रण और अनुशासन का गहरा संस्कार स्थापित करता है।

2. संगठन शक्ति का प्रदर्शन: यह समाज को यह दिखाता है कि जब व्यक्ति सामूहिक रूप से एक ध्येय के लिए संगठित होता है, तो उसमें कितनी शक्ति होती है।

3. समाज से संपर्क: यह एक ऐसा माध्यम है जिससे संघ समाज के हर वर्ग तक पहुँचता है।

4. देशभक्ति का जागरण: घोष, गीत और वंदनाएं हृदय में राष्ट्रप्रेम का संचार करती हैं।

5. युवाओं में नेतृत्व गुण: पथ संचलन युवा स्वयंसेवकों को सेवा और नेतृत्व का पाठ पढ़ाता है।

आर.एस.एस. का पथ संचलन एक सजीव प्रेरणा है—“एक राष्ट्र, एक ध्येय, एक विचार” की ओर अग्रसर होती अनुशासित यात्रा। यह परंपरा हमें बताती है कि जब संगठन, सेवा और संस्कार मिलते हैं, तब राष्ट्र निर्माण की राह प्रशस्त होती है। आज यह आयोजन भारत के कोने-कोने में समाज को जागरूक करने का कार्य कर रहा है और नई पीढ़ी में राष्ट्रभक्ति की लौ प्रज्वलित कर रहा है।

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