उत्तराखंड की देवभूमि में बसा जौनसार-बावर, न केवल अपने भौगोलिक सौंदर्य के लिए जाना जाता है, बल्कि यहां की लोकसंस्कृति भी इसकी आत्मा है। इसी आत्मा को जीवित रखने वाला एक प्रमुख पर्व है — विसु। यह पर्व केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि जौनसार की सांस्कृतिक धड़कन और सामूहिक भावनाओं का उत्सव है।

हर वर्ष अप्रैल के महीने में, जब खेतों में सुनहरी बालियाँ झूमने लगती हैं और पहाड़ों पर वसंत की मुस्कान बिखर जाती है, तब जौनसार में विसु पर्व की आहट सुनाई देती है। यह पर्व नववर्ष का प्रतीक है। किसान अपनी मेहनत की फसल देखकर धन्य हो उठता है और धरती माँ के प्रति आभार व्यक्त करता है।

विसु के दिन हर गांव में एक अलग ही उल्लास देखने को मिलता है। लोग अपने पारंपरिक परिधानों में सजते हैं — पुरुष चकदार पजामा, लोई और टोपी पहनते हैं, जबकि महिलाएँ अपनी रंग-बिरंगी घाघरी, चोली और पिछौड़ा में सजी होती हैं। ढोल-दमाऊं की थाप पर जब ‘हरुल’ और ‘चौंफला’ नृत्य शुरू होता है, तो लगता है जैसे पहाड़ की आत्मा गा रही हो।

विसु का एक विशेष पक्ष है — देव डोलियों का आगमन। जब गांव में देवता पधारते हैं, तो हर आंख श्रद्धा से नम हो जाती है। युवा, वृद्ध, स्त्री-पुरुष सभी देव झांकी में भाग लेते हैं, देवता के दर्शन करते हैं और नई फसल का पहला भाग उन्हें अर्पित करते हैं।

विसु केवल पर्व नहीं, परिवारों का पुनर्मिलन भी है। जो लोग रोज़गार के लिए दूर शहरों में रहते हैं, वे भी इन दिनों गांव लौट आते हैं। बुजुर्गों की आंखें तब भर आती हैं जब वे अपने बच्चों को विसु की परंपराओं में डूबा देखते हैं — वही गीत, वही राग, वही अपनापन। विसु, जौनसार को एक धागे में पिरो देता है।

आज जब आधुनिकता की आंधी सब कुछ बदल रही है, विसु जैसे पर्व हमें हमारी जड़ों से जोड़ते हैं। यह पर्व सिखाता है कि विकास जरूरी है, पर संस्कृति की छांव में ही जीवन का सच्चा रस है। नई पीढ़ी को यह समझाना जरूरी है कि विसु केवल एक त्यौहार नहीं, बल्कि हमारी पहचान का प्रतीक है।

विसु पर्व जौनसार की आत्मा में बसता है। इसमें श्रम की मिठास है, आस्था की गहराई है और संस्कृति की ऊँचाई है। यह पर्व हर वर्ष हमें यह याद दिलाता है कि चाहे दुनिया कितनी भी बदल जाए, जड़ों से जुड़ा इंसान ही सबसे मजबूत होता है।

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