उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित कर्णप्रयाग नगर धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से एक अत्यंत महत्वपूर्ण नगर  है। अलकनंदा और पिंडर नदियों के संगम पर बसा यह नगर महाभारत के वीर योद्धा कर्ण से जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि यहां हर वर्ष बैसाखी के अवसर पर एक विशाल धार्मिक, सांस्कृतिक एवं विकास मेला आयोजित किया जाता है, जिसे कर्णप्रयाग बैसाखी मेला कहा जाता है।

कर्णप्रयाग में बैसाखी मेले की शुरुआत संभवतः 1950 के दशक में हुई थी। प्रारंभ में यह मेला एक स्थानीय धार्मिक आयोजन के रूप में शुरू हुआ, जिसमें लोग कर्ण मंदिर में पूजा अर्चना करने आते थे। मान्यता है कि महाभारत काल में कर्ण ने यहीं पर तप  किया  था  और यहीं पर सूर्य देव से दिव्य कवच-कुंडल प्राप्त किए थे।

धीरे-धीरे इस धार्मिक आयोजन ने सांस्कृतिक मेले का रूप लेना शुरू किया, और स्थानीय प्रशासन तथा जनता के सहयोग से यह मेला आज एक प्रमुख वार्षिक उत्सव बन गया। इसमें धार्मिक गतिविधियों के साथ-साथ सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ, पारंपरिक खेल, स्थानीय उत्पादों की बिक्री, और विकास प्रदर्शनी भी लगाइ जाती है ।

बैसाखी हिंदू नववर्ष का प्रतीक है और फसलों के कटने की खुशी का पर्व है। कर्णप्रयाग में यह दिन विशेष रूप से कर्ण मंदिर में पूजा, हवन और धार्मिक अनुष्ठानों के साथ मनाया जाता है।

यह मेला स्थानीय लोक संस्कृति, नृत्य, गीत, वेशभूषा और हस्तशिल्प को प्रदर्शित करने का माध्यम है। इसके माध्यम से  नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जुड़ने  का अवसर प्राप्त होता है।

मेले में स्थानीय उत्पादों की बिक्री और विकास योजनाओं की प्रदर्शनी से स्थानीय लोगों को रोजगार और जानकारी मिलती है। यह मेला पर्यटन को बढ़ावा देने का भी एक माध्यम बन चुका है।

मेले मै इस प्रकार की गति विधियां होती होती 

कर्ण मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना

लोक कलाकारों द्वारा नृत्य एवं गीतों की प्रस्तुति

स्थानीय व्यंजनों के स्टॉल

हस्तशिल्प एवं कुटीर उद्योगों की प्रदर्शनी

सरकारी योजनाओं की जानकारी देने वाले स्टॉल

खेलकूद प्रतियोगिताएं और सांस्कृतिक झांकियां 

कर्णप्रयाग का बैसाखी मेला अब केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं रहा, बल्कि यह एक समावेशी पर्व बन गया है जो स्थानीय संस्कृति, पर्यटन, आत्मनिर्भरता और विकास को एक साथ जोड़ता है। यह मेला लोक जीवन की जीवंतता और विविधता का उत्सव है।

इस मेले की सफलता का श्रेय उन स्थानीय निवासियों, कलाकारों, प्रशासन और श्रद्धालुओं को जाता है, जो इसे हर वर्ष नई ऊर्जा और उमंग से मनाते हैं।

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