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“यह केवल एक पर्व नहीं, बल्कि हिमालय की धड़कनों का उत्सव है।”

उत्तराखण्ड की संस्कृति को यदि किसी एक पर्व में समेटना हो तो वह न दीपावली होगी, न होली और न ही दशहरा। वह होगा हरेला—जिसे कुमाऊँ में हरेला और गढ़वाल के अनेक भागों में रै सग्रान (कर्क संक्रांति) कहा जाता है। यह वह दिन है जब मनुष्य, प्रकृति और देवत्व एक सूत्र में बंध जाते हैं।

आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, सूखे और पर्यावरण संकट की बात कर रही है, तब उत्तराखण्ड का यह हजारों वर्षों पुराना लोकपर्व दुनिया को सिखाता है कि धरती केवल संसाधन नहीं, हमारी माता है।

हरेला—एक बीज में छिपा पूरा ब्रह्मांड

हरेला का अर्थ केवल “हरियाली” नहीं है। यह उस विश्वास का प्रतीक है कि जीवन का हर नया आरम्भ एक छोटे से बीज से होता है।

कुमाऊँ मंडल मै कर्क संक्रांति से लगभग नौ-दस दिन पहले घरों में बाँस या पत्तों की छोटी टोकरी अथवा मिट्टी के पात्र में गेहूँ, जौ, धान, मक्का, तिल, उड़द, सरसों आदि के बीज बोए जाते हैं। नौ दिनों तक उनकी पूजा होती है और दसवें दिन जब वे सुनहरे-हरे अंकुर बन जाते हैं, तब उन्हें देवताओं को अर्पित कर परिवार के सभी सदस्यों के सिर पर रखा जाता है।

यह केवल शुभकामना नहीं, बल्कि यह घोषणा है कि—

“जैसे यह अंकुर बढ़े हैं, वैसे ही परिवार, समाज, पशुधन और खेत-खलिहान समृद्ध हों।”

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कुमाऊँ का हरेला और गढ़वाल का रै सग्रान

कुमाऊँ में यह पर्व “हरेला” के नाम से प्रसिद्ध है, जबकि गढ़वाल के अनेक क्षेत्रों में इसे रै सग्रान कहा जाता है। नाम अलग हो सकते हैं, पर भावना एक ही है—नई ऋतु का स्वागत, कृषि चक्र का आरम्भ और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता।

कहीं घरों में हरेला रखा जाता है, कहीं कुलदेवताओं को चढ़ाया जाता है, कहीं खेतों में ले जाकर भूमि को समर्पित किया जाता है। यह विविधता ही उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक शक्ति है।

यह भारत का सबसे पुराना “ग्रीन फेस्टिवल” क्यों है?

आज सरकारें करोड़ों रुपये खर्च कर वृक्षारोपण अभियान चलाती हैं, लेकिन उत्तराखण्ड के गाँवों में सदियों से हरेला के दिन पौधे लगाने की परंपरा रही है।

इस दिन लगाया गया पौधा केवल पेड़ नहीं माना जाता, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक जीवित आशीर्वाद समझा जाता है।

यही कारण है कि आज हरेला को उत्तराखण्ड का लोक पर्यावरण महोत्सव भी कहा जाता है।

हरेला का वैज्ञानिक पक्ष

हमारे पूर्वज केवल धार्मिक नहीं, प्रकृति के गहरे वैज्ञानिक भी थे।

वर्षा ऋतु प्रारम्भ होने पर मिट्टी में पर्याप्त नमी होती है। ऐसे समय बोए गए पौधों के जीवित रहने की संभावना सबसे अधिक होती है। इसलिए हरेला को वृक्षारोपण से जोड़ा गया।

इसी प्रकार अंकुरित बीज कृषि की स्थिति, बीज की गुणवत्ता और मौसम की अनुकूलता का प्रतीक भी माने जाते थे।

लोकगीतों में बसता है हरेला

हरेला केवल पूजा नहीं, लोकगीतों का उत्सव भी है। गाँवों में महिलाएँ मंगलगीत गाती हैं और घर-आँगन में उल्लास छा जाता है।

सबसे प्रसिद्ध आशीर्वचन आज भी उत्तराखण्ड के हर गाँव में सुनाई देता है—

“जी रये, जागि रये,धरती जस आगव, आकाश जस चाकव होये,दूब जस फैलिये,सिलपिसि भात खाये,जांठि टेकि झाड़ जाये।”

यह केवल शब्द नहीं, बल्कि दीर्घायु, समृद्धि, स्वास्थ्य और सम्मान का लोकदर्शन है।

प्रकृति का संविधान

हरेला हमें पाँच महान संदेश देता है—

बीज बचाओ।

जल बचाओ।

जंगल बचाओ।

खेती बचाओ।

परिवार और समाज को प्रकृति से जोड़ो।

यही उत्तराखण्ड की संस्कृति का मूल है।

आज की सबसे बड़ी आवश्यकता

आज गाँव खाली हो रहे हैं, खेत बंजर हो रहे हैं और पारंपरिक बीज लुप्त होते जा रहे हैं। ऐसे समय हरेला केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण का अभियान बन सकता है।

यदि हर परिवार हर वर्ष केवल एक पौधा भी लगाए और उसकी रक्षा करे, तो हरेला वास्तव में भविष्य की पीढ़ियों के लिए जीवन का उत्सव बन जाएगा।

हरेला हमें याद दिलाता है कि सभ्यता की शुरुआत किसी महल से नहीं, बल्कि एक बीज से हुई थी।

जब किसान मिट्टी में बीज डालता है, जब माँ हरेला बच्चों के सिर पर रखकर आशीर्वाद देती है, जब गाँव का हर व्यक्ति हरियाली की कामना करता है—तब केवल एक पर्व नहीं मनाया जाता, बल्कि हिमालय स्वयं अपने बच्चों को जीवन का पाठ पढ़ाता है।

हरेला और रै सग्रान इसलिए अमर हैं, क्योंकि ये मनुष्य को प्रकृति का स्वामी नहीं, उसका संरक्षक बनना सिखाते हैं।

हरेला की यही हरियाली उत्तराखण्ड की आत्मा है, और यही उसकी सबसे बड़ी सांस्कृतिक पहचान।

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