‘कैरी मी बैक पॉलिसी’ का असर—12 टन सूखा कचरा केदारनाथ से गौरीकुंड पहुंचा

करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है। हर वर्ष लाखों श्रद्धालु कठिन पैदल यात्रा कर यहां पहुंचते हैं। लेकिन बढ़ती यात्रा के साथ हिमालयी पर्यावरण पर बढ़ता दबाव भी चिंता का विषय रहा है। विशेष रूप से प्लास्टिक की बोतलें, खाद्य पदार्थों के रैपर और पैकेजिंग सामग्री यात्रा मार्ग के लिए बड़ी चुनौती बनती रही हैं।

इसी चुनौती के बीच केदारनाथ में शुरू की गई ‘कैरी मी बैक पॉलिसी’ अब एक अलग तस्वीर सामने ला रही है। इस पहल के तहत श्रद्धालु धाम में उत्पन्न सूखे कचरे को अपने साथ वापस लेकर गौरीकुंड पहुंच रहे हैं।

अब तक 4732 श्रद्धालु इस अभियान का हिस्सा बन चुके हैं और करीब 12 टन सूखा कचरा केदारनाथ से गौरीकुंड तक वापस लाया जा चुका है।

जब श्रद्धालु बने स्वच्छता अभियान का हिस्सा

इस पहल की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें श्रद्धालु केवल सफाई व्यवस्था के लाभार्थी नहीं, बल्कि स्वयं स्वच्छता अभियान के सहभागी बन रहे हैं।

केदारनाथ धाम में श्रद्धालुओं को विशेष बैग उपलब्ध कराए जाते हैं। इन बैगों में वे प्लास्टिक की बोतलें, रैपर, पैकेजिंग सामग्री और अन्य सूखा कचरा जमा करते हैं। यात्रा पूरी करने के बाद यही कचरा वे अपने साथ गौरीकुंड तक लेकर आते हैं।

एक श्रद्धालु के स्तर पर चार-पांच किलोग्राम कचरा भले ही बहुत अधिक न लगे, लेकिन हजारों श्रद्धालुओं की भागीदारी इसे बड़ी मात्रा में परिवर्तित कर देती है। अब तक 12 टन कचरे की वापसी इसका उदाहरण है।

यह व्यवस्था एक महत्वपूर्ण संदेश भी देती है—हिमालय से जो लेकर आए हैं, उसका कचरा भी अपने साथ वापस ले जाएं।

प्रशासन और संस्थाओं की साझेदारी

जिलाधिकारी विशाल मिश्रा के मार्गदर्शन में नगर पंचायत केदारनाथ की ओर से हीलिंग हिमालयास फाउंडेशन एवं सुलभ इंटरनेशनल के सहयोग से इस पहल को संचालित किया जा रहा है।

अभियान के संचालन में विभिन्न संस्थाओं की अलग-अलग जिम्मेदारियां निर्धारित की गई हैं। हीलिंग हिमालयास फाउंडेशन श्रद्धालुओं को कूड़ा संग्रहण के लिए बैग उपलब्ध कराने तथा गौरीकुंड में उसके सुरक्षित संग्रहण की व्यवस्था में सहयोग कर रहा है।

वहीं सुलभ इंटरनेशनल द्वारा एकत्रित कचरे के परिवहन और निर्धारित वैज्ञानिक मानकों के अनुरूप अंतिम निस्तारण की व्यवस्था की जा रही है।

अभियान का संचालन उपजिलाधिकारी ऊखीमठ एवं प्रभारी अधिकारी नगर पंचायत केदारनाथ के निर्देशन में किया जा रहा है।

हिमालय के लिए क्यों जरूरी है यह पहल?

केदारनाथ यात्रा मार्ग सामान्य मैदानी क्षेत्र नहीं है। यह अत्यंत संवेदनशील हिमालयी भू-भाग से होकर गुजरता है। यहां प्राकृतिक परिस्थितियां कठिन हैं और कचरे का प्रबंधन भी मैदानी क्षेत्रों की तुलना में चुनौतीपूर्ण है।

प्लास्टिक और अन्य गैर-जैविक सामग्री यदि खुले में छोड़ दी जाए तो वह लंबे समय तक पर्यावरण में बनी रह सकती है। इससे प्राकृतिक जलस्रोतों, वनस्पतियों और वन्यजीवों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका रहती है।

ऐसे में कचरे को स्रोत क्षेत्र से ही वापस लाने की नीति केवल सफाई व्यवस्था का हिस्सा नहीं है, बल्कि कचरे की जिम्मेदारी तय करने की दिशा में भी एक कदम है।

व्यवस्था से ज्यादा जरूरी है व्यवहार में बदलाव

किसी भी स्वच्छता अभियान की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होती कि कितने कर्मचारी सफाई कर रहे हैं। असली बदलाव तब आता है जब आम नागरिक अपनी जिम्मेदारी समझने लगता है।

केदारनाथ में चल रही यह पहल इसी दिशा में एक प्रयोग है। श्रद्धालु जब अपने बैग में कचरा भरकर वापस गौरीकुंड पहुंचते हैं तो वह केवल कचरा नहीं ला रहे होते, बल्कि यात्रा के दौरान अपने व्यवहार में पर्यावरणीय जिम्मेदारी को भी शामिल कर रहे होते हैं।

4732 श्रद्धालुओं की भागीदारी इस प्रयास की पहुंच को दर्शाती है। हालांकि इस पहल की दीर्घकालिक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि आने वाले समय में कितने अधिक यात्री इससे जुड़ते हैं और एकत्रित कचरे का वैज्ञानिक निस्तारण कितनी निरंतरता से होता है।

आस्था के साथ प्रकृति की जिम्मेदारी

केदारनाथ की यात्रा श्रद्धा, तप और कठिन पर्वतीय यात्रा का संगम है। बाबा केदार के दर्शन के लिए देश के कोने-कोने से लोग यहां पहुंचते हैं।

अब इस यात्रा में एक और संकल्प जुड़ रहा है—धाम को स्वच्छ रखने का संकल्प।

यदि प्रत्येक श्रद्धालु यात्रा के दौरान उत्पन्न अपने कचरे को वापस लाने की आदत बना ले, तो इसका प्रभाव केवल केदारनाथ धाम तक सीमित नहीं रहेगा। यह हिमालयी पर्यटन स्थलों के लिए एक व्यापक पर्यावरणीय मॉडल बन सकता है।

केदारनाथ की ऊंची पर्वत चोटियां आने वाली पीढ़ियों के लिए भी उतनी ही निर्मल रहें, जितनी आज दिखाई देती हैं—इसके लिए प्रशासन, संस्थाओं और श्रद्धालुओं, तीनों की साझी जिम्मेदारी जरूरी है।

12 टन कचरे की वापसी और 4732 श्रद्धालुओं की भागीदारी एक शुरुआत है। असली लक्ष्य तब पूरा होगा, जब स्वच्छता किसी अभियान का हिस्सा नहीं बल्कि हर यात्री की यात्रा-संस्कृति का हिस्सा बन जाए।

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