
उत्तराखंड की पावन धरा पर फिर गूंजेगी वेद मंत्रों की दिव्य ध्वनि। करोड़ों श्रद्धालुओं के हृदय में बसे गंगोत्री व यमुनोत्री धाम के कपाट अक्षय तृतीया के शुभ अवसर पर श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खोल दिए जाएंगे। इसी के साथ चार धाम यात्रा का शुभारंभ भी होगा, जो धर्म, अध्यात्म और संस्कृति का अद्वितीय संगम है।
प्रकृति की गोद में बसा गंगोत्री धाम, सीमांत जनपद उत्तरकाशी में 3140 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है, जहां गंगा अवतरण की पौराणिक गाथाएं जीवंत होती हैं। शीतकाल में मुखवा गांव में माँ गंगा के दर्शन होते हैं, किंतु अक्षय तृतीया के पुण्यपर्व पर माँ गंगा की डोली भव्य श्रृंगार और विधि-विधान के साथ गंगोत्री धाम में प्रवेश करेगी। वैदिक मंत्रोच्चारण के मध्य 30 अप्रैल को प्रातः 10:30 बजे कपाट श्रद्धालुओं के लिए खोले जाएंगे।
यमुनोत्री धाम, जो सुंदर रंवाई घाटी में 3323 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है, भी श्रद्धा का अनूठा केंद्र है। मां यमुना की डोली अपने भाई शनिदेव के सान्निध्य में खुशीमठ से प्रस्थान कर भव्य अनुष्ठान के साथ यमुनोत्री मंदिर पहुंचेगी। अक्षय तृतीया के दिन, 30 अप्रैल को प्रातः 11:55 बजे वैदिक मंत्रोच्चार के साथ यमुनोत्री के कपाट भी विधिवत खोले जाएंगे।
कपाट खुलते ही गूँज उठेगी दिव्यता की गूंज
मान्यता है कि जब धामों के कपाट खुलते हैं, तो करोड़ों देवी-देवता अदृश्य रूप से उपस्थित होकर माँ गंगा व यमुना की स्तुति करते हैं। इस पावन क्षण के साक्षी बनना अपार पुण्य का भागी बनाता है। गंगोत्री में भागीरथी शिला, गौरीकुंड, प्राणोत्सर्ग स्थल जैसे दिव्य स्थल इस गाथा के मौन साक्षी हैं, जहां हर कण में आस्था का स्पंदन है।
गंगोत्री और यमुनोत्री का इतिहास: आस्था के अनमोल अध्याय
20वीं शताब्दी में जयपुर नरेश माधोसिंह द्वारा निर्मित गंगोत्री मंदिर सफेद ग्रेनाइट शिलाओं से बना एक स्थापत्य चमत्कार है। वहीं यमुनोत्री मंदिर की स्थापना टिहरी नरेश प्रताप शाह द्वारा की गई, जो माँ यमुना के आदिशक्ति स्वरूप की भव्यता को दर्शाता है।
चार धाम यात्रा: पुनः जाग उठेगा श्रद्धा का महासागर
गंगोत्री और यमुनोत्री के कपाट खुलने के साथ ही चार धाम यात्रा का शुभारंभ हो जाएगा, जो भारतवर्ष के हर कोने से श्रद्धालुओं को हिमालय की इस दिव्यता का साक्षात्कार करने के लिए खींच लाएगा। यह यात्रा न केवल शारीरिक यात्रा है, अपितु आत्मा की भी यात्रा है — भीतर से उजाले की ओर, शुद्धि की ओर।
आइए, इस अक्षय तृतीया पर स्वयं को जोड़ें इस दिव्य अवसर से, जहां प्रकृति, परंपरा और परमात्मा एक हो जाते हैं। माँ गंगा और माँ यमुना के चरणों में शीश नवाकर जीवन को पुण्यतम बनाएं।


