ज्योतिर्मठ की शांत व पवित्र वादियों में आज धर्म, भक्ति और ज्ञान की अद्भुत त्रिवेणी बहती रही। उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठ के परम पूज्य शंकराचार्य स्वामिश्रीः अविमुक्तेश्वरानंदः सरस्वती ‘१००८’ महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा —

जो शरणागत है, उसकी रक्षा स्वयं धर्म करता है। उसे कभी नहीं त्यागना चाहिए।”

धर्मसभा के केंद्र में भगवान शंकर के गुरु स्वरूप और सनातन धर्म की महान गुरु-शिष्य परंपरा का प्रकाश रहा। स्वामिश्रीजी ने कहा कि भगवान शंकर ने स्वयं गुरु का रूप धारण कर आदिशंकराचार्य के रूप में अवतार लिया। वे चार वेदों को साथ लेकर चलायमान मूर्ति के रूप में प्रकट हुए, ताकि धर्म का पुनर्निर्माण हो सके।

शंकराचार्य जी ने भावभीनी कथा सुनाई कि किस प्रकार गिरि नामक विनम्र सेवक, जो बाह्य प्रदर्शन से दूर था, गुरु कृपा से एक दिन तोटक छंद में वेदों का सारगर्भित गान कर बैठा। उसकी वाणी इतनी सजीव थी कि स्वयं आदि शंकराचार्य भी प्रसन्न हो उठे। उसी दिन से गिरि का नाम तोटकाचार्य पड़ा, जो बाद में ज्योतिर्मठ के प्रथम पीठाधिपति बने।

पूज्य स्वामिश्री ने कहा:
“वास्तविक विद्वता दंभ से नहीं, सेवा और समर्पण से प्रकट होती है। सच्चा शिष्य वही है जो स्वयं को गुरु के चरणों में पूर्णतया समर्पित कर दे।”

ज्योतिर्मठ परिसर में आयोजित इस पावन धर्मसभा में श्रद्धालुओं ने एकटक भाव से शंकराचार्य जी के दिव्य वचनों का रसास्वादन किया। इस अवसर पर बहुगुणा परिवार द्वारा सपत्नीक पादुका पूजन व अभिषेक किया गया। सभा में विष्णुप्रियानंद ब्रह्मचारी, शिवानंद उनियाल, शिवानंद महाराज, मनोज भट्ट, जगदीश उनियाल, महिमानंद उनियाल, वैभव सकलानी, दीपेंद्र नायक, राहुल साहू सहित अनेक श्रद्धालु उपस्थित रहे।

सभा के उपरांत भक्ति संगीत और वेदपाठ से वातावरण गूंज उठा। उपस्थित साधकों के मन में धर्म, समर्पण और साधना की अखंड ज्वाला प्रज्वलित होती रही।

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