
उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठ के परमधर्माधीश, पूज्यपाद जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामिश्री अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज ने अपने 9 दिवसीय ज्योतिर्मठ प्रवास के दौरान आयोजित धर्मसभा में गूढ़ और प्रेरणादायक विचार प्रकट किए। उन्होंने कहा — “जगद्गुरु वह नहीं जिसे सारा जगत गुरु माने, बल्कि वह है जो जगत की वास्तविकता का बोध करवा सके।”
शंकराचार्य जी ने कहा कि सत्य ज्ञान अमृत के समान है। उन्होंने ज्ञान और धन की तुलना करते हुए बताया कि धन जितना खर्च करो, उतना घटता है, परंतु ज्ञान जितना बाँटो, उतना ही बढ़ता है। माँ सरस्वती का यह खजाना जितना खर्च करोगे, उतना ही समृद्ध होता जाएगा। उन्होंने कहा, “यदि नदी अपने जल को बहने न दे और एक ही जगह संचित कर ले, तो वह नदी नहीं, तालाब बन जाती है।”
उपनिषदों की महिमा पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने समझाया कि केवल सुनने से लाभ नहीं, सुनकर उसका अर्थ समझना आवश्यक है। भगवान आदिगुरु शंकराचार्य जी ने अनेक उपनिषदों पर भाष्य कर मानव समाज को दिशा दी।
पूज्यपाद जी ने कहा, “हमें उस देवता या व्यक्ति की पूजा करनी चाहिए, जिसका आचरण उत्तम हो। जो दुख देखकर दुखी हो जाए, वह दयालु है, और जो दुख की कल्पना मात्र से व्याकुल हो जाए, वह करुणामय है।”
समस्याओं की जड़ समझाते हुए उन्होंने कहा — “शरीर की व्यथा संसार की समस्या नहीं है। कोई भी विषय तब तक समस्या है, जब तक हम उसे नहीं समझते। जैसे ही उसे समझ लेते हैं, वह खतरा नहीं रह जाता। इसलिए यदि हमने संसार को जान लिया, तो कोई भी डर शेष नहीं रहता।”
पाप और पुण्य के विषय में उन्होंने कहा कि “पाप का फल दुख है और पुण्य का फल सुख। गुरु की शरण में जाने से पाप कर्मों की प्रवृत्ति रुकती है। गुरु कहते हैं — पुण्य भोग की इच्छा भी छोड़ दो। जब शिष्य पुण्य के फल की इच्छा भी त्याग देता है, तब उसका चित्त निर्मल होता है और सच्चे ज्ञान की प्यास जागती है।”
इस अवसर पर श्रद्धालु श्री शिवानन्द उनियाल जी ने अपनी पत्नी सहित पूज्यपाद महाराज जी की चरणपादुका का पूजन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। धर्मसभा में ज्योतिर्मठ प्रभारी दंडी स्वामी प्रत्यक्चैतन्यमुकुंदानंद गिरी, स्वामी अप्रमेयशिवसाक्षात्कृतानंद गिरी, स्वामी श्रीनिधिरव्ययानंदसागर महाराज, ब्रह्मचारी विष्णुप्रियानन्द जी, नगरपालिका अध्यक्षा श्रीमति देवेश्वरी शाह, श्रीमति सुषमा डिमरी, श्रीमति शांति चौहान, श्री शिवानन्द उनियाल, महिमानंद उनियाल सहित अनेक श्रद्धालु उपस्थित रहे।


