
उत्तराखंड की पावन भूमि में स्थित श्री बदरीनाथ धाम, केवल एक तीर्थ स्थल नहीं, बल्कि भारतीय सनातन संस्कृति की जीवंत धरोहर है। हर वर्ष लाखों श्रद्धालु चारधाम यात्रा के अंतर्गत इस परम धाम की ओर प्रस्थान करते हैं, किंतु कपाटोद्घाटन का पर्व विशेष आध्यात्मिक उल्लास का अवसर बनकर आता है।
इस वर्ष रविवार, 4 मई 2025 प्रातः 6 बजे, श्री बदरीनाथ धाम के कपाट श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ विधिवत रूप से खोले जा रहे हैं। कपाट खुलने से पूर्व की यात्रा की पावन शुरुआत जोशीमठ स्थित श्री नृसिंह मंदिर से हुई, जहाँ विधिपूर्वक भगवान बदरीविशाल के वाहन श्री गरूड़ जी, आदि गुरु शंकराचार्य जी की गद्दी, श्री रावल अमरनाथ नंबूदरी एवं अन्य पूज्य प्रतीकों की पूजा-अर्चना सम्पन्न हुई।
इस अवसर पर सेना के बैंड की भक्तिमय ध्वनि के साथ देव डोलियों ने पांडुकेश्वर के लिए प्रस्थान किया। विशेष उल्लेखनीय यह रहा कि इतिहास में पहली बार श्री गरूड़ जी को भव्य समारोहपूर्वक बद्रीनाथ धाम के लिए रवाना किया गया, जिससे श्रद्धालुओं में विशेष हर्ष और उत्साह देखा गया। 3 मई की संध्या को ये देव डोलियां पांडुकेश्वर से बद्रीनाथ धाम पहुंचेगीं, और फिर 4 मई को कपाट दर्शनार्थ खुलेंगे।
रावल परंपरा की ऐतिहासिक नींव
श्री बदरीनाथ धाम में पूजा-अर्चना की वर्तमान परंपरा जिसे ‘रावल परंपरा’ कहा जाता है, वर्ष 1776 में टिहरी नरेश द्वारा प्रारंभ की गई थी। उस समय ज्योर्तिमठ के 42वें शंकराचार्य श्री रामकृष्ण तीर्थ के ब्रह्मलीन हो जाने से पीठ आचार्य विहीन हो गया। तब टिहरी राजा ने मंदिर में पूजा की नियमितता बनाए रखने हेतु दक्षिण भारतीय नंबूदरी ब्राह्मण को ‘रावल’ नियुक्त किया। यह परंपरा आज भी श्री बदरीनाथ धाम की गरिमा और साधना की रीढ़ बनी हुई है।
समकालीन चुनौती: मतैक्य की आवश्यकता
जहाँ एक ओर यह पावन यात्रा श्रद्धा और आस्था से ओतप्रोत रही, वहीं दूसरी ओर जोशीमठ में तीन-तीन शंकराचार्यों का विवाद सनातन धर्म के अनुयायियों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। यह परिस्थिति यह प्रश्न उठाती है कि जब धर्म ही एकजुटता और मार्गदर्शन का आधार हो, तो अनुयायियों को तीन मतों में बँटने की स्थिति क्यों बन रही है?
सनातन परंपरा की प्रतिष्ठा के लिए यह आवश्यक है कि विचारधाराएँ समन्वित हों, और धर्माचार्य धर्म की मूल भावना को केंद्र में रखकर एकमत हों।
आस्था का जीवंत उत्सव
कपाटोत्सव के इस पावन अवसर पर श्री नृसिंह मंदिर से लेकर श्री बदरीनाथ धाम तक, श्रद्धालुओं, हक-हकूकधारियों, मंदिर समिति, पुजारियों और प्रशासनिक अधिकारियों ने मिलकर एक अनुपम आयोजन को सफल बनाया। बीकेटीसी मीडिया प्रभारी डॉ. हरीश गौड़, मुख्य कार्याधिकारी श्री विजय प्रसाद थपलियाल, वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश कपरवाण, रावल अमरनाथ नंबूदरी, डिमरी पुजारीगण तथा स्थानीय प्रतिनिधियों की समर्पित उपस्थिति ने इसे ऐतिहासिक बनाया।
यह यात्रा केवल मंदिरों की नहीं, हमारी संस्कृति, संवेदना और आध्यात्मिक चेतना की यात्रा है।
“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” — भगवान बदरीविशाल सभी श्रद्धालुओं को आशीर्वाद दें, और धर्म, परंपरा एवं एकता के पथ पर अग्रसर करें।



