
14 से 26 मई तक उत्तराखंड के चमोली जनपद में स्थित माणा गांव एक बार फिर भक्ति, परंपरा और संस्कृति की त्रिवेणी में डुबकी लगाएगा। हर 12 वर्षों में एक बार बृहस्पति के मिथुन राशि में प्रवेश पर मनाया जाने वाला पुष्कर कुंभ इस बार भव्य और ऐतिहासिक रूप लेने जा रहा है।
पावन संगम की भूमि
बदरीनाथ धाम से मात्र 3 किमी दूर स्थित माणा गांव सरस्वती और अलकनंदा के संगम स्थल केशव प्रयाग के लिए प्रसिद्ध है। यही संगम स्थल दक्षिण भारतीय वैष्णव समुदाय के लिए विशेष धार्मिक महत्व रखता है। इस दौरान श्रद्धालु तर्पण, पिंडदान, स्नान और पूजा के माध्यम से मोक्ष की कामना करते हैं।

श्रद्धालुओं का अभूतपूर्व जनसैलाब
तेलंगाना, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक जैसे राज्यों से चार लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने पंजीकरण कराया है। आयोजकों के अनुसार, इस बार कुल 10 लाख से अधिक श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है। श्री त्रिदंडी श्रीमन्नारायण रामानुज चिन्ना जीयर विजयवाड़ा की घोषणा के अनुसार, आयोजन 14 से 26 मई तक चलेगा।
गांव में तैयारियां चरम पर
ग्राम प्रधान पीतांबर मोल्फा के अनुसार, गांव के निवासी होमस्टे, होटल, दुकानें और बुनियादी सुविधाएं सुसज्जित कर चुके हैं। भगवान बद्री विशाल के कपाट खुलने के साथ ही गांव में अब तक एक लाख से अधिक यात्री पहुंच चुके हैं। भंडारों की बुकिंग भी बड़ी संख्या में हो चुकी है।

2013 की स्मृति, 2025 की भव्यता
गौरतलब है कि वर्ष 2013 में केदारनाथ आपदा के एक दिन पूर्व ही पुष्कर कुंभ सम्पन्न हुआ था। भारी बारिश के बावजूद श्रद्धालु आयोजन में सम्मिलित हुए थे। अब 12 वर्ष बाद फिर यह आयोजन एक नई आस्था और ऊर्जा के साथ लौट रहा है।
खगोलीय संयोग और वैदिक मान्यता
बद्रीधाम के धर्माधिकारी राधा कृष्ण थपलियाल बताते हैं कि दक्षिण भारत की परंपरा के अनुसार जब बृहस्पति ग्रह मिथुन राशि में प्रवेश करता है, तब माणा में स्थित सरस्वती-संगम पर पुष्कर कुंभ का आयोजन होता है। यह कुंभ विष्णु भक्ति में रमे दक्षिण भारतीयों के लिए जीवन का पुण्यकाल होता है।
पुष्कर कुंभ 2025 केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक विविधता, खगोलीय परंपरा और आध्यात्मिक एकता का साक्षात उदाहरण है। हिमालय की गोद में बसा माणा गांव इस वर्ष एक नई धार्मिक चेतना का केंद्र बनेगा — जहाँ आस्था, परंपरा और प्रकृति मिलकर एक अनुपम आध्यात्मिक अनुभव रचेंगे।




