संघ की शाखा से लेकर श्री बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के उपाध्यक्ष बनने तक का सफर किसी चमत्कार से कम नहीं लगता, परंतु यह चमत्कार किसी जादू से नहीं, बल्कि निरंतर सेवा, निष्ठा और धैर्य की तपस्या से संभव हुआ है। यह कहानी है ऋषि प्रसाद सती की – एक साधारण विद्यार्थी से लेकर उत्तराखंड की धार्मिक और सांस्कृतिक अस्मिता के सबसे बड़े केंद्र की बागडोर संभालने वाले व्यक्ति की।

सन 1988 में जब ऋषि प्रसाद सती पहली बार भारतीय जनता पार्टी से जोशीमठ नगर पालिका के सभासद बने, तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यह युवा इतनी लंबी और संघर्षपूर्ण राजनीतिक यात्रा तय करेगा। 1988 से लेकर 2008 तक, वे अलग-अलग वार्डों से लगातार सभासद बनते रहे और इसी बीच वे राम जन्मभूमि आंदोलन में सक्रिय रहे, जेल भी गए और जोशीमठ व्यापार सभा के अध्यक्ष बने। 1994 में उन्होंने उत्तराखंड आंदोलन में भी अग्रणी भूमिका निभाई – यह जनता के विश्वास और उनके सेवा भाव का प्रमाण था।

फिर आया 2008 का साल, जब वे सीमांत नगर पालिका जोशीमठ के अध्यक्ष बने। अपने कार्यकाल में उन्होंने जोशीमठ के विकास के लिए कई क्रांतिकारी कदम उठाए – नगर के बीचों-बीच बहने वाले नाले का सुधार, पार्किंग व्यवस्था को दुरुस्त करना, जल और सीवर समस्याओं का समाधान, पालिका की आय बढ़ाने के लिए गेस्ट हाउसों का निर्माण और 2010 से जोशीमठ को पूर्णतः प्लास्टिक मुक्त करवाना – हर निर्णय में उनकी दूरदर्शिता स्पष्ट दिखाई दी। कर्मचारियों के हितों की रक्षा के लिए भी उन्होंने साहसिक फैसले लिए।

2011 में तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ से वार्ता कर औली में सैफ गेम्स कराकर स्कीइंग को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने की पहल की। यह केवल खेल का आयोजन नहीं था, यह पूरे क्षेत्र के विकास की नींव थी।

2013 के बाद भी उनकी यात्रा नहीं रुकी। उन्हें भाजपा प्रदेश कार्यसमिति का सदस्य बनाया गया, वे बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के विशेष आमंत्रित सदस्य रहे, गंगा सेवा समिति में योगदान दिया और दो बार सदस्यता प्रमुख जैसे संगठनात्मक जिम्मेदारियाँ निभाईं। लेकिन फिर भी, 11 वर्षों तक उन्हें कोई बड़ा राजनीतिक पद नहीं मिला।

यह वह दौर था जब किसी भी साधारण कार्यकर्ता की उम्मीदें टूट सकती थीं। परंतु ऋषि प्रसाद सती ने अपने भीतर की श्रद्धा, धैर्य और निष्ठा को कम नहीं होने दिया। उन्होंने कभी पार्टी से शिकायत नहीं की, कभी सेवा से मुंह नहीं मोड़ा।

और फिर, 3 मई 2025 को किस्मत ने करवट ली। बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने से ठीक एक दिन पूर्व उन्हें श्री बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति का उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया। यह केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं थी – यह उन हजारों निष्ठावान कार्यकर्ताओं के लिए आशा का दीप बन गई, जो वर्षों से निस्वार्थ भाव से सेवा में लगे रहे हैं।

ऋषि प्रसाद सती की यह यात्रा इस बात का प्रमाण है कि संघर्ष चाहे जितना भी लम्बा क्यों न हो, यदि नीयत साफ हो और सेवा का भाव अडिग हो, तो सफलता एक दिन निश्चित ही कदम चूमती है।

आज वे न केवल एक पद पर आसीन हैं, बल्कि उन कार्यकर्ताओं की प्रेरणा बन चुके हैं, जो संगठन को परिवार मानकर तपस्यारत रहते हैं। ऋषि प्रसाद सती का जीवन यही सिखाता है – सच्चा कार्यकर्ता कभी हारता नहीं, वह बस समय आने का धैर्यपूर्वक इंतजार करता है।

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