
उत्तराखंड की हिमालयी वादियों में एक ऐसी दिव्य, दुर्लभ और दुरूह यात्रा है, जो केवल धार्मिक आस्था का प्रदर्शन नहीं, बल्कि हजारों वर्षों की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक विरासत का प्रतीक बन चुकी है। नन्दा देवी राजजात यात्रा, जिसे हिमालयी महाकुंभ कहा जाता है, न केवल एशिया की सबसे लंबी पैदल धार्मिक यात्रा है, बल्कि यह उत्तराखंड की सामूहिक चेतना और लोक परंपराओं का जीवंत उत्सव भी है। इस यात्रा की शुरुआत जिस सिद्धपीठ कुरुड़ से होती है, वह न केवल एक स्थान है, बल्कि नंदा देवी की मूल चेतना का केंद्र, लोकश्रद्धा का आधार और यात्रा की आत्मा है
पौराणिक और ऐतिहासिक महत्त्व:
माँ नन्दा देवी को गढ़वाल और कुमाऊँ के राजवंशों की इष्टदेवी माना जाता है। उन्हें राजराजेश्वरी, शिवा, सुनन्दा, नन्दिनी, शुभानन्दा आदि नामों से भी जाना जाता है। नन्दा देवी को कहीं पार्वती की बहन तो कहीं स्वयं पार्वती का रूप माना गया है। उत्तराखंड के लोकमानस में नन्दा देवी मात्र एक देवी नहीं, बल्कि बेटी, बहन और कुल की रक्षा करने वाली शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
नन्दा देवी से जुड़ी यात्रा दो प्रकार की होती है — वार्षिक जात और राजजात। वार्षिक जात प्रतिवर्ष कुरुड़ से वेदनी कुण्ड तक जाती है और लौट आती है। जबकि राजजात हर 12 वर्षों या अधिक अंतराल के बाद होती है, जो सिद्धपीठ कुरुड़ से आरंभ होकर 280 किलोमीटर की खड़ी, पथरीली, बर्फीली व दुर्गम पहाड़ियों को पार कर होमकुंड तक जाती है और वहाँ से लौटकर नन्दप्रयाग होते हुए फिर नौटी में पूर्ण होती है।

सिद्धपीठ कुरुड़: यात्रा का आदिप्रस्थान बिंदु
कुरुड़ गांव में स्थित प्राचीन नन्दा मंदिर इस यात्रा का आध्यात्मिक केंद्र है। मान्यता है कि जब तक बधाण क्षेत्र में स्थित इस मंदिर से माँ नन्दा की डोली नहीं चलती, तब तक राजजात यात्रा आरंभ नहीं मानी जाती। नंदानगर, थराली और देवाल के समस्त पड़ावों के समन्वय के साथ जब नन्दा देवी की डोली बधाण क्षेत्र से यात्रा में प्रवेश करती है, तभी आगे की यात्रा को धार्मिक मान्यता मिलती है।
इतिहास साक्षी है कि सिद्धपीठ कुरुड़ से ही दशोली, बधाण और चान्दपुर की डोलियाँ यात्रा में सम्मिलित होती रही हैं। इसीलिए, नन्दा राजजात को कुरुड़ सिद्धपीठ से ही प्रारंभ किया जाना धार्मिक दृष्टिकोण से अनिवार्य है। पुरातात्विक प्रमाण जैसे रूपकुण्ड के नरकंकाल, बगुवावासा में स्थित आठवीं सदी की गणेश मूर्ति, आदि इस यात्रा की ऐतिहासिकता को प्रमाणित करते हैं।

राजजात यात्रा की विशेषताएँ:
1. 280 किमी की कठिन पदयात्रा: यह यात्रा समुद्र तल से 3200 फुट से लेकर 17500 फुट तक की ऊंचाई तय करती है, जिसमें 19 मुख्य पड़ाव और वाण अंतिम गांव होता है।
2. चौसिंग्या खाडू: चार सींगों वाला एक विशिष्ट मेंढा, जो यात्रा से पूर्व किसी न किसी क्षेत्र में चमत्कारी रूप से जन्म लेता है और यात्रा के अंतिम चरण में होमकुंड से अकेला ही कैलाश की ओर प्रस्थान करता है।
3. रिंगाल की छंतोलियाँ: पारंपरिक कारीगरी से बनी छतोलियाँ, जो नन्दा देवी की प्रतीक हैं, यात्रा में श्रद्धा और समर्पण के साथ ले जाई जाती हैं।
4. विराट सहभागिता: लगभग 200 से अधिक देवी-देवताओं की डोलियाँ इस यात्रा में सम्मिलित होती हैं। जहाँ-जहाँ यात्रा रात्रि विश्राम करती है, वहाँ के ग्रामीण अपने घर यात्रियों के लिए खोल देते हैं और स्वयं गौशालाओं में रहते हैं।
कुरुड़ की उपेक्षा : एक चिंता का विषय
वर्तमान यात्रा की तैयारियों के संदर्भ में जब 2026 की राजजात की बैठक कर्णप्रयाग में हुई, तो सिद्धपीठ कुरुड़ से आए प्रतिनिधियों ने एक स्वर में इसका विरोध किया कि इतने ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व के बाद भी कुरुड़ को उचित मान्यता नहीं दी जा रही। कुरुड़ मंदिर समिति, स्थानीय पुजारीगण, 21 प्रतिनिधियों, बधाण के 14 सयाने, चान्दपुर के थोकी ब्राह्मण, सभी ने माँ नन्दा देवी की यात्रा का आरंभ कुरुड़ से ही करने की मांग की।
यह न केवल धार्मिक परंपरा की रक्षा का विषय है, बल्कि लोकमानस की आस्था और इतिहास की प्रतिष्ठा का भी प्रश्न है। लाटू देवता वाण से अगुवानी करते हैं, लेकिन माँ नन्दा देवी की प्रथम अगुवाई सिद्धपीठ कुरुड़ से ही होती है।
आवश्यकता: धार्मिक परंपराओं का सम्मान
यात्रा के पारंपरिक प्रारंभ स्थल कुरुड़ को वैधानिक और आध्यात्मिक मान्यता प्रदान की जानी चाहिए।
राजजात समिति का पुनर्गठन कर कुरुड़, थराली, देवाल आदि क्षेत्रों को उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।
राज्य शासन, पर्यटन विभाग और धार्मिक संस्थाओं को मिलकर इस यात्रा को संरक्षित करना होगा ताकि यह यात्रा मात्र पर्यटन न रह जाए, बल्कि आस्था का महायज्ञ बनी रहे।
नन्दा देवी राजजात यात्रा कोई सामान्य धार्मिक यात्रा नहीं, यह एक लोककथा है, जो हर बार पुनः जिया जाता है। यह एक ऐसी यात्रा है, जो न केवल देवभूमि के भूगोल से गुजरती है, बल्कि यहाँ की आत्मा को जोड़ती है। सिद्धपीठ कुरुड़, इस आत्मा का उद्गम है। यदि यात्रा की आत्मा से उसका मूल स्रोत ही काट दिया गया, तो वह केवल एक सांस्कृतिक आयोजन बन कर रह जाएगी।
इसलिए, जब माँ नन्दा देवी की डोली अगली बार निकले, तो वह उसी राह से चले जहाँ से सदियों से उसकी यात्रा शुरू होती आई है — कुरुड़ सिद्धपीठ से। यही धर्म है, यही परंपरा है, और यही लोक की आस्था का सार है।





