
परिवारों की चिंता और बच्चों का भविष्य
उत्तराखंड के गांवों-कस्बों में काम करने वाले छोटे ठेकेदार केवल ठेकेदार नहीं हैं, बल्कि हजारों परिवारों की रोज़ी-रोटी का सहारा हैं। उनके घर का चूल्हा उन्हीं कामों से जलता है, जिनसे प्रदेश के गांवों में सड़क, स्कूल, आंगनबाड़ी, पुल और पानी की टंकियाँ बनती रही हैं।
लेकिन सरकार द्वारा जारी नए मानक निविदा प्रपत्र (SBD) ने इन परिवारों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। नए नियमों की कठोर शर्तों ने उनकी काम करने की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। सवाल यह है कि अगर उन्हें काम नहीं मिलेगा, तो उनके बच्चों का भविष्य कौन सँभालेगा?

नया नियम: बड़े कॉरपोरेट्स के लिए खुला दरवाज़ा
30 जून 2025 से लागू हुए इस नए नियम में पहले की तुलना में अनुभव और कार्य प्रमाण पत्र की शर्तें कई गुना बढ़ा दी गई हैं।
पहले 50% तक कार्य अनुभव का प्रमाण देना होता था, अब यह 200% कर दिया गया है।
पहले 25% तक समान कार्य का अनुभव पर्याप्त था, अब इसे 80% कर दिया गया है।
यह शर्तें इतनी कठिन हैं कि छोटे ठेकेदार इनके दायरे से बाहर हो जाएंगे। यानी स्थानीय ठेकेदारों की जगह अब केवल बड़ी कंपनियाँ ही ठेके हासिल कर पाएंगी।

छोटे ठेकेदारों की पीड़ा
ठेकेदारों का कहना है—
“हमारे पास इतना बड़ा अनुभव और पैसा नहीं है। हम तो गांव-गांव के छोटे काम करके ही अपने बच्चों को पाल रहे हैं। अगर हमें काम ही नहीं मिलेगा, तो हमारे घर का चूल्हा कैसे जलेगा?”
उनकी यह पीड़ा बताती है कि यह नियम केवल कागज़ी सुधार नहीं है, बल्कि हज़ारों परिवारों के जीवन पर सीधा प्रहार है।
विनोद चमोली की आवाज़
ठेकेदारों ने अपनी समस्या लेकर धर्मपुर विधायक विनोद चमोली से मुलाकात की। विधायक ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर आग्रह किया है कि इन कठोर शर्तों को वापस लिया जाए। उन्होंने चेताया है कि—
“यदि यह नियम लागू रहे तो 10 करोड़ तक की निविदाओं से भी छोटे ठेकेदार बाहर हो जाएंगे और स्थानीय लोग बेरोज़गार हो जाएंगे।”
विकास या विस्थापन?
सरकार कहती है कि यह नियम पारदर्शिता और गुणवत्ता लाने के लिए हैं। लेकिन असल में यह नियम विकास के नाम पर स्थानीय ठेकेदारों को किनारे कर बाहरी कंपनियों को काम दिलाने का माध्यम बनते दिख रहे हैं।
प्रश्न यह है कि क्या विकास का अर्थ केवल बड़ी कंपनियों को लाभ पहुँचाना है? क्या छोटे ठेकेदारों के बच्चे भूखे रहकर ही “गुणवत्ता” का बोझ उठाएंगे?
निष्कर्ष
उत्तराखंड का विकास तभी सार्थक है जब उसकी जड़ें स्थानीय समाज में मजबूत हों। छोटे ठेकेदार न केवल निर्माण कार्य करते हैं, बल्कि स्थानीय युवाओं और मजदूरों को रोजगार भी देते हैं।
अगर सरकार ने उनकी आवाज़ को अनसुना किया, तो यह नया नियम हजारों परिवारों की रोज़ी-रोटी छीन लेगा और प्रदेश के विकास को बाहरी कंपनियों के हवाले कर देगा।
आज जरूरत है कि सरकार ठेकेदारों की इस पुकार को सुने और ऐसे निर्णय ले जिससे विकास भी हो और उत्तराखंड के लोग भी सुरक्षित रहें।

