
पहाड़ केवल पत्थरों का ढेर नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक आत्मा और जीवनदायिनी नदियों का उद्गम स्थल हैं। लेकिन बीते वर्षों में जिस तरह हिमालयी क्षेत्र में आपदाएँ लगातार बढ़ी हैं, उन्होंने हमें चेताया है कि हमने विकास की दिशा में कहीं न कहीं गंभीर भूलें की हैं।
लगातार बढ़ती आपदाएँ
पिछले कुछ वर्षों में हिमालयी क्षेत्र में घटित घटनाएँ किसी एक राज्य की त्रासदी नहीं बल्कि राष्ट्रीय आपदा का संकेत हैं।
2021, रैणी (चमोली): झील फटने से आई भीषण बाढ़ ने एनटीपीसी की सुरंग को ध्वस्त कर दिया और 100 से अधिक लोग मारे गए। इसका असर हरिद्वार तक देखा गया।
2023, जोशीमठ (उत्तराखंड): पूरा नगर धंसने लगा, 800 से अधिक घरों में दरारें आईं और लोग अपने ही आशियानों से बेघर हो गए।
2024, हिमाचल: शिमला, कुल्लू, किन्नौर और मंडी में भूस्खलन और बादल फटने से सैकड़ों लोग मारे गए, घर-पुल बह गए और पूरा राज्य महीनों तक अव्यवस्था से जूझता रहा।
2024, कश्मीर: अमरनाथ गुफा और घाटी में बादल फटने की घटनाओं ने दर्जनों श्रद्धालुओं की जान ली, गाँव और सड़कें तबाह हो गईं।
2025, थराली और धराली (उत्तराखंड): हाल की घटनाओं में बाजार, घर और वाहन मलबे में दब गए, लोग रातोंरात घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों की ओर भागे।
ये सभी घटनाएँ सिर्फ “प्राकृतिक आपदाएँ” नहीं हैं, बल्कि प्रकृति के साथ किए गए हमारे असंवेदनशील व्यवहार की सीधी परिणति हैं।

समस्या की जड़
हिमालय एक युवा पर्वतमाला है, जो भूगर्भीय दृष्टि से पहले से ही अस्थिर है। उस पर हमने किया है।
अंधाधुंध सड़क और बांध निर्माण।
वनों की अंधाधुंध कटाई।
नदी-नालों और गाड-गधेरों पर अतिक्रमण।
अवैज्ञानिक खनन और सुरंग निर्माण।
ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन ने इसमें और आग में घी का काम किया है। अब बारिश धीरे-धीरे नहीं होती, बल्कि कुछ ही घंटों में बादल फटने जैसी घटनाएँ पहाड़ों को तोड़ देती हैं।
राष्ट्रीय खतरे की घंटी
उत्तराखंड, हिमाचल या कश्मीर में जो हो रहा है, वह केवल उन राज्यों की समस्या नहीं है। यहाँ से निकलने वाली गंगा, यमुना और सिंधु जैसी नदियाँ करोड़ों लोगों की जीवनरेखा हैं। यदि हिमालय असुरक्षित हुआ, तो इसका सीधा असर पूरे देश के जल, अन्न और ऊर्जा संसाधनों पर पड़ेगा।

अब क्या करना होगा?
1. हिमालय के लिए अलग नीति: एक राष्ट्रीय हिमालयन प्राधिकरण का गठन कर विकास और पर्यावरण का संतुलन सुनिश्चित किया जाए।
2. वैज्ञानिक दृष्टिकोण: सड़क, बांध और सुरंग निर्माण से पहले कठोर भूगर्भीय परीक्षण हों।
3. वन और जलस्रोतों का संरक्षण: पुनर्वनीकरण, पारंपरिक जल-निकासी तंत्र और गाड़-गधेरों को पुनर्जीवित करना होगा।
4. जनसंख्या और पर्यटन पर नियंत्रण: संवेदनशील क्षेत्रों में होटल और भवन निर्माण की सीमा तय करनी होगी।
5. स्थानीय समुदाय की भागीदारी: आपदा प्रबंधन और चेतावनी तंत्र में गाँव और कस्बों के लोगों को निर्णायक भूमिका दी जाए।
निष्कर्ष-
हिमालय की करुण पुकार अब साफ़ सुनाई दे रही है। थराली, धराली, रैणी, जोशीमठ, हिमाचल और कश्मीर की घटनाएँ केवल चेतावनी नहीं, बल्कि भविष्य की भयावह तस्वीर भी हैं।
यदि हमने अभी भी प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण विकास का रास्ता नहीं चुना, तो आने वाली पीढ़ियों को केवल खंडहर और मलबा ही विरासत में मिलेगा।
