
29 अगस्त यह तारीख केवल कैलेंडर की एक तारीख भर नहीं है, बल्कि भारतीय खेल इतिहास का गौरव है। यही वह दिन है जब देश मे हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद को याद करते हुए राष्ट्रीय खेल दिवस मनाया जाता है। और इस वर्ष भी, चार साल की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए ज्योतिर्मठ के रविग्राम खेल मैदान ने इस दिन को उत्सव में बदल दिया।
तीन दिवसीय यह आयोजन केवल प्रतियोगिता का मंच नहीं, बल्कि युवाओं को उनके सपनों से जोड़ने का प्रयास है। इसे देखकर सहज ही यह विश्वास जगता है कि ज्योतिर्मठ की नई पीढ़ी केवल किताबों और डिग्रियों तक सीमित नहीं, बल्कि पसीने और संघर्ष से अपना भविष्य गढ़ रही है।
खेल से बड़ा कोई शिक्षक नहीं

समारोह का शुभारंभ ध्वजारोहण से हुआ।
मुख्य अतिथि बीकेटीसी उपाध्यक्ष ऋषि प्रसाद सती ने ध्वज फहराकर इस खेल महोत्सव का आगाज़ किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता नगर पालिका अध्यक्ष देवेश्वरी शाह ने की।
विशिष्ट अतिथियों में नगर भाजपा अध्यक्ष अमित सती, पूर्व पालिका अध्यक्ष शैलेन्द्र पंवार, और सामाजिक कार्यकर्ता रमा राणा उपस्थित रहीं।
यह दृश्य अपने आप में इस बात का प्रतीक था कि नेतृत्व और युवाशक्ति जब एकजुट होते हैं, तो खेल मैदान ही भविष्य गढ़ने की प्रयोगशाला बन जाते हैं।
प्रतिभाओं का सम्मान, सपनों को संबल

ज्योतिर्मठ के इस आयोजन की सबसे बड़ी विशेषता है — स्थानीय प्रतिभाओं को पहचान देना।
राष्ट्रीय स्तर पर टेबल टेनिस में पहचान बना चुके खिलाड़ी और उनके कोच विजय कुमार को सम्मानित किया गया।
वहीं स्की माउंटेनियरिंग में ज्योतिर्मठ के शार्दुल थपलियाल, जिन्होंने नॉर्वे में वर्ल्ड चैंपियनशिप में भारत का प्रतिनिधित्व किया, विशेष सम्मान के पात्र बने।
यह सम्मान केवल व्यक्तियों का नहीं, बल्कि उस आशा का भी है जो हर बच्चे की आंखों में चमकती है जब वह खेल मैदान में पहला कदम रखता है।
विविधता का संगम

तीन दिनों तक इस मैदान में खेलों की गूंज रहेगी। टेबल टेनिस से लेकर कबड्डी, शतरंज से लेकर फुटबॉल और रस्साकशी से लेकर क्रॉस कंट्री तक — हर खेल यह बताएगा कि समाज तब तक जीवंत है, जब तक उसके युवा पसीना बहाना जानते हैं।
समिति का सराहनीय प्रयास
युवा खेल विकास समिति और इसके अध्यक्ष सौरव राणा का यह प्रयास निस्संदेह प्रशंसनीय है। जब समाज की संस्था युवा पीढ़ी के लिए ऐसा मंच तैयार करती है, तो यह केवल खेल आयोजन नहीं, बल्कि संस्कारों और मूल्यों की खेती होती है।
निष्कर्ष
आज जब मोबाइल और आभासी दुनिया युवाओं को बाँधने लगी है, ऐसे में ज्योतिर्मठ का यह आयोजन एक सशक्त संदेश देता है—
कि राष्ट्र निर्माण न तो केवल संसदों में होता है, न केवल प्रयोगशालाओं में; राष्ट्र निर्माण खेल मैदानों में भी उतना ही होता है।
राष्ट्रीय खेल दिवस पर यह पहल बताती है कि छोटे कस्बों और दूरदराज़ के गांवों में भी भारत का भविष्य संजोया हुआ है।
और यह भविष्य तब और उज्ज्वल होगा, जब हर बच्चा मैदान में दौड़ेगा, गिरेगा, उठेगा और फिर मुस्कुराकर कहेगा—
“खेल ही मेरी ताकत है, खेल ही मेरी पहचान।”
