
हिमालय जब मुस्कुराता है तो पूरी दुनिया उसकी सुंदरता का गुणगान करती है। बर्फ से ढकी चोटियाँ, कल-कल बहती भागीरथी, सेब के बाग और देवदार के घने वन हर किसी को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। लेकिन जब यही हिमालय रोता है, तब उसकी चीखें केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि पूरे समाज की संवेदनाओं को झकझोर देती हैं।
धराली की त्रासदी ऐसी ही एक चीख थी।
आज उस भयावह आपदा को एक वर्ष पूरा हो गया। समय ने कैलेंडर का एक पन्ना अवश्य बदल दिया है, लेकिन उन परिवारों के जीवन में वह दिन आज भी थमा हुआ है, जिन्होंने अपने घर, अपने सपने और अपने प्रियजनों को एक ही पल में खो दिया था। पहाड़ों में कहा जाता है कि “समय घाव भर देता है”, परंतु धराली की मिट्टी आज भी उन घावों की गवाही दे रही है जिन्हें कोई समय पूरी तरह नहीं भर सकता।
बरसी के अवसर पर जब पूरे गांव ने अपने दिवंगतों को श्रद्धांजलि दी, दो मिनट का मौन रखा और शांति पाठ किया, तब वह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं था। वह उन अधूरी कहानियों का मौन था जो प्रकृति के रौद्र रूप के सामने अचानक समाप्त हो गईं। जिलाधिकारी प्रशांत आर्य द्वारा देवदार का पौधा रोपना और ग्रामवासियों द्वारा 101 पौधों का वृक्षारोपण इस बात का प्रतीक है कि स्मृतियाँ केवल तस्वीरों में नहीं, बल्कि धरती की हरियाली में भी जीवित रखी जा सकती हैं।

लेकिन इस बरसी का सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या हमने धराली से कुछ सीखा है?
उत्तराखंड का इतिहास बार-बार हमें चेतावनी देता रहा है। केदारनाथ, रैणी, सिलक्यारा, जोशीमठ, और अब धराली—हर त्रासदी हमें यह बताती है कि हिमालय केवल पर्यटन का स्थल नहीं, बल्कि एक जीवित और अत्यंत संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र है। विकास आवश्यक है, लेकिन ऐसा विकास जो प्रकृति की सीमाओं का सम्मान न करे, अंततः विनाश का कारण बनता है।
धराली की आपदा के बाद सरकार और जिला प्रशासन ने राहत, पुनर्वास और पुनर्निर्माण के क्षेत्र में अनेक सराहनीय कार्य किए। सड़कें फिर बनीं, बिजली लौटी, पेयजल व्यवस्था बहाल हुई, आजीविका के साधनों को पुनर्जीवित करने का प्रयास हुआ और प्रभावित परिवारों को सहारा देने की दिशा में लगातार काम किया गया। यह प्रशासनिक संवेदनशीलता स्वागत योग्य है। लेकिन पुनर्निर्माण का अर्थ केवल भवन खड़े करना नहीं होता; पुनर्निर्माण का अर्थ है लोगों के भीतर टूटे हुए विश्वास को फिर से जीवित करना।
धराली की बरसी हमें यह भी याद दिलाती है कि आपदा प्रबंधन केवल राहत सामग्री बाँटने तक सीमित नहीं रह सकता। हमें वैज्ञानिक भू-अध्ययन, सुरक्षित निर्माण, नदी तटों के संरक्षण, ढलानों के उपचार, समयबद्ध चेतावनी प्रणाली और पर्यावरण आधारित विकास नीति को प्राथमिकता देनी होगी। यदि पहाड़ सुरक्षित रहेगा, तभी पहाड़ का भविष्य सुरक्षित रहेगा।
कल्प केदार मंदिर के जीर्णोद्धार की मांग भी केवल एक धार्मिक आग्रह नहीं है। उत्तराखंड के गांवों में मंदिर सामाजिक जीवन का केंद्र होते हैं। उनका पुनर्निर्माण लोगों के मनोबल और सांस्कृतिक पहचान को फिर से खड़ा करने का प्रयास है। इसलिए पुनर्निर्माण की प्रक्रिया में संस्कृति और आस्था को भी समान महत्व मिलना चाहिए।

धराली के लोगों ने अपने बिछड़े अपनों की स्मृति में 101 पौधे लगाए हैं। यह केवल वृक्षारोपण नहीं, बल्कि एक संदेश है कि “विनाश के बाद भी जीवन का बीज बोया जा सकता है।” शायद यही पहाड़ की सबसे बड़ी शक्ति है—वह हर बार टूटकर भी फिर खड़ा हो जाता है।
लेकिन समाज के रूप में हमारी जिम्मेदारी भी कम नहीं है। आपदा के समय कुछ दिन तक संवेदनाएँ उमड़ती हैं, कैमरे पहुंचते हैं, खबरें बनती हैं, फिर सब अपने-अपने जीवन में लौट जाते हैं। सबसे कठिन समय तब शुरू होता है जब कैमरे चले जाते हैं और पीड़ित परिवार अपने टूटे हुए जीवन के साथ अकेले रह जाते हैं। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारी संवेदनाएँ केवल बरसी तक सीमित न रहें, बल्कि पुनर्वास की अंतिम सीढ़ी तक उनके साथ चलें।
धराली की पहली बरसी केवल शोक का दिन नहीं है। यह आत्ममंथन का दिन है। यह संकल्प का दिन है। यह उस वचन को दोहराने का दिन है कि विकास और प्रकृति के बीच संतुलन ही उत्तराखंड का भविष्य तय करेगा।
आइए, आज हम केवल दिवंगत आत्माओं को श्रद्धांजलि ही न दें, बल्कि यह प्रण भी लें कि हिमालय की चेतावनियों को अब अनसुना नहीं करेंगे। क्योंकि यदि पहाड़ सुरक्षित रहेगा, तभी हमारी नदियाँ सुरक्षित रहेंगी, हमारी संस्कृति सुरक्षित रहेगी और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी सुरक्षित रहेगा।
धराली आज भी हमें पुकार रहा है। प्रश्न केवल इतना है—क्या हम उसकी पुकार सुन रहे हैं, या फिर अगली त्रासदी का इंतज़ार कर रहे हैं?
लेखक : इन्दर सिंह बिष्ट
प्रधान संपादक, हिमाल रैबार
