
हिमालय की दिव्य तपोभूमि ज्योतिर्मठ में इन दिनों चातुर्मास्य व्रत एवं साधना का पावन क्रम भक्ति, तप और आध्यात्मिक चेतना से आलोकित हो रहा है। इसी आध्यात्मिक वातावरण में आयोजित शिवपुराण कथा के पंचम दिवस शनिवार को श्रद्धालुओं का ऐसा सैलाब उमड़ा कि पूरा कथा परिसर हर-हर महादेव और शिव महानाम के संकीर्तन से गुंजायमान हो उठा।
हिमालय की शांत वादियों में जब शिव महिमा का गुणगान हुआ तो मानो वातावरण में एक अलग ही आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार हो गया। कथा स्थल पर पहुंचे श्रद्धालु भजनों और संकीर्तन में ऐसे भावविभोर हुए कि कुछ समय के लिए संसार की आपाधापी से दूर स्वयं को भगवान शिव की भक्ति में समर्पित कर दिया।
शिव के दिव्य चरित्र से कराया साक्षात्कार
शिवपुराण कथा के पंचम दिवस कथा व्यास विजय सेमवाल ने भगवान शिव के दिव्य स्वरूप, उनके विविध अवतारों और मंगलमय चरित्र का भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने शिव भक्ति के उस गूढ़ रहस्य को भी श्रद्धालुओं के समक्ष रखा, जिसमें भगवान शिव को केवल देवाधिदेव महादेव ही नहीं, बल्कि समस्त जीवों के कल्याणकारी और करुणामय आश्रय के रूप में देखा गया है।
उन्होंने कहा कि भगवान शिव की शरण में जाने वाला व्यक्ति अपने भीतर की नकारात्मकताओं से मुक्त होने की दिशा में आगे बढ़ता है। शिव की आराधना मनुष्य के कायिक, वाचिक और मानसिक दोषों का शमन करती है तथा उसे आत्मशुद्धि और मोक्ष के मार्ग की ओर ले जाती है।
कथा व्यास ने कहा कि शिव भक्ति केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है। सच्ची शिव भक्ति का अर्थ है—मन में करुणा, वाणी में मधुरता, कर्म में पवित्रता और जीवन में निष्काम भाव का समावेश। जब मनुष्य अपने कर्मों को भगवान को समर्पित कर देता है, तब उसके जीवन में भक्ति का वास्तविक प्रकाश प्रकट होता है।

निष्काम भक्ति ही शिव आराधना का सार
कथा के उपरांत आशीर्वचन देते हुए स्वामी प्रत्यक्चैतन्यमुकुन्दानन्द गिरि जी महाराज ने श्रद्धालुओं को शिव भक्ति का मर्म समझाया। उन्होंने कहा कि भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए बाहरी आडंबर से अधिक आवश्यक है अंतःकरण की शुद्धता।
उन्होंने कहा कि निष्काम भाव से की गई शिव पूजा ही सच्ची भक्ति है। जब भक्त भगवान से अपने लिए कुछ मांगने के बजाय स्वयं को भगवान के चरणों में समर्पित कर देता है, तब भक्ति अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त करती है।
स्वामी जी ने कहा कि शिव का स्मरण मनुष्य को भीतर से मजबूत करता है। सांसारिक जीवन में आने वाले सुख-दुःख, लाभ-हानि और उतार-चढ़ाव के बीच भगवान शिव का आश्रय मनुष्य को धैर्य, विवेक और आत्मबल प्रदान करता है। यही भक्ति जीव को भवसागर से पार उतारने का माध्यम बनती है।
ज्योतिर्मठ की तपोभूमि में गूंजा शिव महानाम
ज्योतिर्मठ स्वयं आदि शंकराचार्य की तपोभूमि और सनातन आध्यात्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। ऐसी पवित्र भूमि पर चातुर्मास के अवसर पर शिवपुराण कथा का आयोजन श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक सौभाग्य का अवसर बन गया है।
कथा के दौरान जब शिव महानाम का संकीर्तन हुआ तो पूरा वातावरण भक्तिरस में डूब गया। श्रद्धालु हाथ जोड़कर, आंखें बंद कर और शिव नाम का स्मरण करते हुए कथा का श्रवण करते रहे। दूर-दराज क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु कथा सुनने पहुंचे।
कथा परिसर में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति के चेहरे पर श्रद्धा और आस्था का भाव दिखाई दे रहा था। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो हिमालय की गोद में स्वयं कैलाशपति महादेव की महिमा का साक्षात्कार हो रहा हो।

श्रद्धालुओं ने लिया प्रसाद और आशीर्वाद
इस अवसर पर ज्योतिर्मठ के व्यवस्थापक विष्णुप्रियानन्द ब्रह्मचारी, कुशलानन्द बहुगुणा, महिमानन्द उनियाल, जगदीश उनियाल, नगर पालिका अध्यक्षा श्रीमती देवश्वरी शाह, रोहिणी रावत, आरती उनियाल, सरिता उनियाल सहित अनेक गणमान्य नागरिक एवं सैकड़ों श्रद्धालु मौजूद रहे।
कथा के समापन पर विधिवत भव्य आरती की गई। आरती के समय पूरा कथा परिसर घंटियों, जयघोष और शिव नाम के संकीर्तन से गूंज उठा। इसके बाद श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया गया।
चातुर्मास के इस पावन अवसर पर ज्योतिर्मठ में चल रही शिवपुराण कथा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, संस्कार और आध्यात्मिक जागरण का माध्यम बनती दिखाई दे रही है। कथा का संदेश यही है कि जब मनुष्य अपने भीतर के अहंकार, लोभ और मोह को त्यागकर निष्काम भाव से महादेव की शरण में जाता है, तब उसके जीवन में भक्ति का प्रकाश प्रकट होता है।
हिमालय की इस दिव्य तपोभूमि से उठता हर-हर महादेव का स्वर मानो यही संदेश दे रहा है—शिव ही सत्य हैं, शिव ही कल्याण हैं और शिव की शरण ही जीवन का परम आश्रय है।
