नंदानगर से देवाल-वाण तक सवाल एक ही—आखिर पहाड़ का आदमी कब तक जान जोखिम में डालकर विकास की कीमत चुकाता रहेगा?

उत्तराखंड में विकास की रफ्तार के दावे लगातार किए जा रहे हैं। सड़कें बन रही हैं, पुलों और सुरंगों की बातें हो रही हैं, दूरस्थ गांवों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। लेकिन चमोली के दूरस्थ गांवों से सामने आई ये तस्वीरें सरकारी विकास के दावों के बीच एक ऐसा आईना खड़ा करती हैं, जिसे नजरअंदाज करना आसान नहीं है।

एक तरफ विकास की चमक है और दूसरी तरफ पहाड़ के गांवों की वह हकीकत, जहां आज भी ग्रामीणों को उफनते गदेरों को पार करके अपनी रोजी-रोटी जुटानी पड़ रही है।

नंदानगर विकासखंड के अंतिम छोर पर बसे सकंड ग्वाई, मीमराणी और बराली गांवों की तस्वीर देखिए। बरसात में जब पहाड़ों से उतरने वाले गदेरों का पानी अपने रौद्र रूप में आता है, तब यही जलधारा ग्रामीणों के लिए रास्ता नहीं, बल्कि जिंदगी और मौत के बीच खींची एक खतरनाक लकीर बन जाती है।

लेकिन जिंदगी रुकती नहीं।

किसी को बाजार जाना है, किसी को रोजगार के लिए निकलना है, किसी को जरूरी सामान लाना है तो किसी को अस्पताल पहुंचना है। पहाड़ का ग्रामीण जानता है कि सामने खतरा है, फिर भी उसे उस खतरे के बीच से गुजरना पड़ता है।

क्योंकि उसके पास दूसरा रास्ता नहीं है।

यह केवल मजबूरी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर सवाल है जो आजादी के दशकों बाद भी पहाड़ के अंतिम गांवों को सुरक्षित आवागमन की गारंटी नहीं दे पाई।

और फिर देखिए गामरी गाड़ की तस्वीर…

चमोली के देवाल–वाण मोटर मार्ग पर गामरी गाड़ के पास पिछले 24 घंटे से अधिक समय से सड़क बंद है। लगातार भूस्खलन, मलबा और भारी बोल्डरों ने सड़क को पूरी तरह बाधित कर दिया है।

सड़क पर जमा मलबा अब दलदल में बदल चुका है।

देवाल पहुंचना जरूरी है। बाजार पहुंचना जरूरी है। अस्पताल पहुंचना जरूरी है। बच्चों और परिवार की जरूरतें पूरी करना जरूरी है।

लेकिन रास्ता बंद है।

तो ग्रामीणों ने क्या किया?

पोकलैंड मशीन का बकेट उनके लिए रास्ता बन गया।

वीडियो में दिखाई देता है कि किस तरह ग्रामीण भारी मशीन के बकेट में बैठकर दलदल और मलबे वाले हिस्से को पार कर रहे हैं।

सोचिए…

जिस मशीन को सड़क से मलबा हटाकर रास्ता खोलना था, उसी मशीन का बकेट आज ग्रामीणों के लिए अस्थायी पुल बन गया है।

यह तस्वीर सिर्फ विचलित नहीं करती, बल्कि विकास की पूरी अवधारणा पर सवाल खड़ा करती है।

क्या यही है पहाड़ का विकास?

हम अक्सर कहते हैं कि सड़क गांव तक पहुंच गई, इसलिए विकास पहुंच गया।

लेकिन क्या सड़क का होना ही विकास है?

अगर बारिश में सड़क बंद हो जाए…

अगर एक गदेरा उफनते ही गांव का संपर्क टूट जाए…

अगर मरीज अस्पताल तक न पहुंच सके…

अगर किसान अपनी उपज बाजार तक न ले जा सके…

अगर बच्चे स्कूल जाने से डरें…

और अगर ग्रामीणों को पोकलैंड के बकेट में बैठकर सड़क पार करनी पड़े…

तो फिर हमें खुद से पूछना होगा—

हमने सड़क बनाई है या सिर्फ सड़क का कागज बनाया है?

प्रकृति को दोष देकर व्यवस्था कब तक बचेगी?

उत्तराखंड हिमालयी राज्य है। भूस्खलन, बादल फटना, अतिवृष्टि और बरसाती गदेरों का उफान यहां की प्राकृतिक वास्तविकता है।

इस सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता।

लेकिन क्या हर साल आने वाली आपदा को केवल ‘प्राकृतिक आपदा’ कहकर अपनी जिम्मेदारी खत्म कर देना पर्याप्त है?

अगर किसी स्थान पर हर मानसून भूस्खलन होता है, तो वहां स्थायी समाधान क्यों नहीं?

अगर कोई गदेरा हर साल ग्रामीणों के लिए खतरा बनता है, तो वहां सुरक्षित पुल क्यों नहीं?

अगर कोई सड़क बार-बार बंद होती है, तो उसके संवेदनशील हिस्सों का वैज्ञानिक उपचार क्यों नहीं?

और अगर कोई क्षेत्र भूस्खलन के कारण लंबे समय तक कट जाता है, तो वहां वैकल्पिक संपर्क व्यवस्था क्यों नहीं?

प्रकृति को रोकना संभव नहीं, लेकिन प्रकृति को समझकर विकास करना तो संभव है।

यही असली चुनौती है।

पहाड़ को सिर्फ सड़क नहीं, सुरक्षित रास्ता चाहिए

हिमालय में विकास का मतलब मैदानों की तरह सिर्फ सड़क चौड़ी कर देना नहीं हो सकता।

यहां सड़क बनाने से पहले पहाड़ की भूगर्भीय संरचना को समझना होगा। बरसाती जलधाराओं का वैज्ञानिक अध्ययन करना होगा। संवेदनशील क्षेत्रों में उचित ड्रेनेज, कलवर्ट, पुल और सुरक्षा दीवारों की व्यवस्था करनी होगी।

जहां सड़क हर साल टूटती है, वहां केवल मलबा हटाकर उसे दोबारा खोलना समाधान नहीं है।

स्थायी समाधान चाहिए।

क्योंकि हर साल करोड़ों रुपये मलबा हटाने में खर्च करने से बेहतर है कि उन स्थानों का वैज्ञानिक और स्थायी उपचार किया जाए।

आंकड़ों से नहीं, आखिरी गांव की जिंदगी से मापिए विकास

सरकार के पास विकास के आंकड़े होंगे।

कितने किलोमीटर सड़क बनी।

कितने पुल बने।

कितनी धनराशि खर्च हुई।

कितने गांव सड़क से जुड़े।

लेकिन पहाड़ के लिए विकास का असली आंकड़ा इससे अलग है।

बरसात में कितने गांव सड़क से कटे नहीं?

कितने मरीज समय पर अस्पताल पहुंचे?

कितने बच्चों की पढ़ाई बारिश के कारण बाधित नहीं हुई?

कितने ग्रामीणों को उफनते गदेरे में उतरने की जरूरत नहीं पड़ी?

और कितने लोगों को पोकलैंड की बकेट में बैठकर अपनी जान जोखिम में नहीं डालनी पड़ी?

यही विकास की असली परीक्षा है।

पहाड़ सवाल पूछ रहा है…

सकंड ग्वाई, मीमराणी और बराली का गदेरा हो या गामरी गाड़ का भूस्खलन क्षेत्र—दोनों जगह कहानी अलग है, लेकिन दर्द एक है।

सुरक्षित रास्ते का अभाव।

एक तरफ ग्रामीण उफनते पानी के बीच से गुजर रहा है।

दूसरी तरफ ग्रामीण पोकलैंड के बकेट में बैठकर सड़क पार कर रहा है।

दोनों तस्वीरें मिलकर पहाड़ की एक ही कहानी कहती हैं—

विकास पहुंचा जरूर है, लेकिन अभी सुरक्षित जीवन नहीं पहुंचा।

और यही सबसे बड़ा सवाल है।

सरकारें आती हैं, योजनाएं बनती हैं, बजट आता है, सड़कें बनती हैं और उद्घाटन होते हैं।

लेकिन जब मानसून आता है तो पहाड़ फिर वहीं खड़ा मिलता है—

एक हाथ में जिंदगी की जरूरतें और सामने उफनता गदेरा।

कहीं सड़क है तो उस पर पहाड़ टूट रहा है।

कहीं सड़क नहीं है तो ग्रामीण गदेरे में उतर रहा है।

और कहीं सड़क बंद है तो पोकलैंड की बकेट ही पुल बन गई है।

यह सिर्फ चमोली की तस्वीर नहीं है। यह पूरे पहाड़ के विकास मॉडल के सामने खड़ा सवाल है।

प्रकृति से लड़कर नहीं, प्रकृति को समझकर विकास करना होगा।

पहाड़ को ऐसी सड़क चाहिए जो सिर्फ उद्घाटन के दिन नहीं, बरसात के सबसे कठिन दिन भी उसके साथ खड़ी रहे।

उसे ऐसे पुल चाहिए जो सिर्फ यातायात का साधन नहीं, बल्कि लोगों की जिंदगी की सुरक्षा बनें।

और उसे ऐसी व्यवस्था चाहिए जहां किसी मां को अपने बच्चे को उफनते गदेरे में उतारने का डर न हो और किसी बुजुर्ग को पोकलैंड के बकेट में बैठकर जिंदगी का जोखिम न उठाना पड़े।

क्योंकि विकास का सबसे अंतिम छोर वही है, जहां सड़क खत्म होती है और इंसान की मजबूरी शुरू होती है।

और आज चमोली का पहाड़ सरकार से यही पूछ रहा है—

“आखिर कब तक विकास की कीमत पहाड़ का आदमी अपनी जान जोखिम में डालकर चुकाता रहेगा?”

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