उत्तराखंड के दिव्य हिमालय में स्थित बदरीनाथ धाम—जिसे भूवैकुण्ठ कहा जाता है—आज एक बार फिर श्रद्धा, भक्ति और भावनाओं के सागर से भर उठा। वैशाख शुक्ल सप्तमी की शुभ तिथि पर प्रातः 6 बजे भगवान बदरीविशाल के कपाट विधिवत रूप से खुल गए। यह केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का एक दिव्य क्षण था।

कपाट उद्घाटन से पूर्व धर्माधिकारी श्री राधाकृष्ण थपलियाल जी द्वारा पंचांग पूजन सम्पन्न किया गया। मन्दिर के द्वार खुलते ही हजारों भक्तों की आंखों से अश्रुधारा बहने लगी क्योंकि वे केवल पत्थर की मूर्ति नहीं, साक्षात् बल्कि नारायण से  साक्षात्कार कर रहे थे।

इस पुण्य अवसर पर उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठाधीश्वर, जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्री अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ‘१००८’ जी महाराज स्वयं उपस्थित रहे। उन्होंने भक्तों को संदेश दिया—

“तीर्थयात्रा केवल दर्शनों तक सीमित न रहे। यहां आकर मौन रहें, भगवन्नाम का संकीर्तन करें, और पर्यावरण की शुद्धता बनाए रखें। लौकिक सुख क्षणिक होता है, परन्तु आध्यात्मिक सुख जीवनभर की शांति देता है। उस अनुभूति को शब्दों में बयान  नहीं की जाति, बल्कि अनुभव से जानें।”

बदरीनाथ यात्रा का उद्देश्य केवल यात्रावृत्तांत नहीं,  अपितु यह आत्मा की भी यात्रा है। अगले छह माह तक मुख्य पुजारी श्री अमरनाथ नम्बूदरी जी भगवान बदरीविशाल की पूजा करेंगे। यह परंपरा रावल संप्रदाय की हजारों वर्षों पुरानी आत्मा है, जो आज भी उसी श्रद्धा और शुद्धता के साथ जीवित है।

इस अवसर पर उपस्थित विशिष्ट जनों में शामिल थे—

निवर्तमान रावल श्री ईश्वरप्रसाद नम्बूदरी जी,

प्रत्यक्षचैतन्यमुकुन्दानन्द गिरि जी,

स्वामी संविदानन्द गिरि जी,

श्रीनिधिरव्यानन्द सागर जी,

अप्रमेयशिवसाक्षात्कृतानन्द गिरि जी,

शारदानन्द ब्रह्मचारी जी,

वेदपाठी रविन्द्र भट्ट जी,

वेदपाठी अमित बन्दोलिया जी,

जिलाधिकारी श्री संदीप तिवारी जी,

मन्दिर समिति के मुख्य कार्याधिकारी श्री विजय थपलियाल जी,

तथा ज्योतिर्मठ के सीईओ चन्द्रप्रकाश उपाध्याय जी सहित अनेक श्रद्धालु। मौजुद रहे। 

यह अवसर केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि एक जागृति थी कि जीवन की भागदौड़ में थमकर आत्मा को वह ‘शाश्वत शांति’ दी जाए, जिसकी खोज में हम सभी अनजाने में हैं।

“बदरीनाथ की यात्रा तन से नहीं, मन और आत्मा से होती है जहां कदम रुकते हैं, वहीं से  भक्ति शुरू होती  है 

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