
जब देश में हरित क्रांति के नाम पर बीज, खाद और कीटनाशकों के बाज़ार का बोलबाला था, तब उत्तराखंड की टिहरी घाटियों में एक किसान चुपचाप बीजों की आत्मा को बचाने में लगा था। उस किसान का नाम है विजय जड़धारी। उन्होंने अपने हाथों में हल नहीं, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए बीजों की थाली थामी। उन्होंने न सिर्फ बीजों को बचाया, बल्कि खोती जा रही खेती की संस्कृति, पर्यावरण और आत्मनिर्भरता की विरासत को फिर से जीवित किया।
‘बीज बचाओ आंदोलन’: एक किसान से जन आंदोलन तक
1986 में विजय जड़धारी ने ‘बीज बचाओ आंदोलन’ की शुरुआत की। यह कोई राजनीतिक आंदोलन नहीं था, न ही इसमें कोई मंच या प्रचार था। यह तो खेतों की मिट्टी, फसलों की खुशबू और बीजों की आत्मा से जुड़ा आंदोलन था। वह समझते थे कि बीज केवल अन्न नहीं हैं, वे हमारी संस्कृति, स्वास्थ्य, और आत्मनिर्भरता के मूल हैं।

बारहनाजा: मिट्टी से रिश्ते को फिर से जोड़ने वाली खेती
विजय जड़धारी ने उत्तराखंड की पारंपरिक ‘बारहनाजा’ खेती पद्धति को फिर से पहचान दिलाई। बारहनाजा यानी बारह प्रकार की फसलें—मंडुआ, मक्का, राजमा, कुल्थी, भट्ट, उड़द, लोबिया, रामदाना, ज्वार, तिल, भांग, जख्या—ये केवल अनाज नहीं, बल्कि एक जैविक पारिस्थितिकी तंत्र हैं। यह खेती मनुष्य और पशु दोनों की ज़रूरतों को पूरा करती है और धरती की उर्वरता को भी बनाए रखती है।
बारहनाजा का सबसे बड़ा संदेश है: विविधता में ही समृद्धि है। यह monoculture (एकल फसल) की खतरनाक दिशा से हटाकर खेती को सहजीविता की ओर लौटाता है।
जब खेतों ने भी ली छुट्टी
जड़धारी जी मानते हैं कि खेतों को भी आराम चाहिए। बारहनाजा खेती में रबी सीजन में खेतों को परती छोड़ा जाता है ताकि मिट्टी अपनी जैविक ऊर्जा वापस पा सके। पशुओं को इन खेतों में छोड़ा जाता है जिससे गोबर और मूत्र मिट्टी को फिर से जीवंत कर देते हैं। यह वह सोच है जो आधुनिक विज्ञान से पहले हमारे पुरखों ने विकसित की थी।
मंडुआ से मोरिओका तक
उत्तराखंड के मंडुआ की पौष्टिकता को आज दुनिया पहचान रही है। जापान की कंपनियों ने विजय जड़धारी द्वारा बचाए गए पारंपरिक मंडुआ को बच्चों के आहार के लिए खरीदा। यही नहीं, अब शहरों में मंडुआ का आटा गेहूं से कई गुना महंगे दाम पर बिक रहा है। एक समय जो ‘गरीबों का अनाज’ समझा जाता था, आज पोषण के मामले में सबसे अमीर फसल बन चुका है।
‘जीरो बजट खेती’ बिना हल चलाए गेहूं की फसल
2020 में विजय जड़धारी ने एक नया प्रयोग किया—बिना खेत जोते गेहूं उगाना। उन्होंने धान की कटाई के बाद खेत में गेहूं बोकर उसे पराली से ढक दिया। बिना किसी रासायनिक खाद, बिना पानी, बिना हल—केवल प्रकृति के नियमों के सहारे गेहूं की शानदार फसल हुई। उन्होंने इसे ‘जीरो बजट खेती’ कहा और यह आज किसानों के लिए एक नई राह बन चुकी है।

एक अकेला बीज, लाखों उम्मीदें
विजय जड़धारी का संघर्ष सिर्फ बीजों का नहीं है, यह हमारी खेती, हमारी मिट्टी, और हमारी आत्मा को बचाने का संघर्ष है। उन्होंने कभी हार नहीं मानी, न सरकार से, न परिस्थितियों से, न बाज़ार से। उन्हें इंदिरा गांधी पर्यावरण पुरस्कार मिला, लेकिन उनका असली सम्मान तो उन खेतों की हरियाली है, जिनमें आज भी बारहनाजा लहलहा रही है।
अंतिम बात
जहाँ दुनिया जैविक खेती की तरफ लौट रही है, वहीं विजय जड़धारी पहले ही यह राह दिखा चुके हैं। वे किसान हैं, लेकिन उनकी सोच एक दार्शनिक की तरह गहरी है। उनके बीजों में सिर्फ अनाज नहीं, बल्कि उम्मीदें, संस्कार और भविष्य छुपा है।



