
ये कोई फिल्म की कहानी नहीं है।
ये कोई मनगढ़ंत स्क्रिप्ट भी नहीं।
ये हकीकत है — एक मासूम पहाड़ी लड़के की, जिसका नाम है मनोज।
एक ऐसा नाम, जो आज पहाड़ की हवाओं में गूंज रहा है ग़ायब है, लेकिन भूला नहीं गया।
वो लड़का… मनोज।
हर रोज़ सुबह उठता। अपने गाँव बाँजबगड़ से दूर, गोविंदघाट से घाँघरिया और फिर हेमकुंड साहिब की कठिन चढ़ाई पर घोड़े की लगाम पकड़ता। यात्रियों को सहारा देता। मुस्कुराते हुए कहता — “बाबा जी, पहुँच जाओगे आराम से।”
वो अपनी मेहनत से घर के चूल्हे को जलाए रखने का सपना देख रहा था। लेकिन 29 जून की रात… वो सपना भी खो गया, और वो लड़का भी।
29 जून की रात — एक ख़ामोशी जो सवालों से भरी है
उस रात कुछ हुआ — कुछ ऐसा जो अब तक रहस्य बना हुआ है।
घोड़े के मालिक देवेन्द्र चौहान से झगड़ा हुआ। हाथापाई तक मामला बढ़ा। फिर पुलिस चौकी पहुँचा और वहीं निपटा भी बताया गया।
लेकिन इसके बाद मनोज अपने डेरे पर वापस गया। सब सो गए।
सुबह उठे तो — मनोज गायब था।
कहाँ गया मनोज?
अब सवाल उठते हैं — बहुत से सवाल:
अगर मनोज सुबह डेरे में नहीं था, तो मालिक ने फ़ौरन पुलिस को सूचना क्यों नहीं दी?
उसका मोबाइल घंटों तक घंटी देता रहा, फिर अचानक स्विच ऑफ क्यों हो गया?
झगड़े के बाद क्या वाकई सब कुछ सामान्य था?
CCTV फुटेज भी खामोश क्यों हैं?
क्या कहीं किसी ने कोई साजिश तो नहीं रची?
मनोज के घरवाले जब 3-4 दिन तक संपर्क नहीं कर पाए, तब वो चिंतित हुए।
फोन बजता रहा, लेकिन कोई जवाब नहीं आया।
अंततः उसका भाई गाँव के अन्य लड़कों के साथ निकल पड़ा — उस भाई को उम्मीद थी कि छोटा भाई मिल जाएगा, किसी होटल में या टेरेस पर सो गया होगा।
लेकिन वहाँ जाकर सच्चाई मिली — कि 29 जून के बाद से मनोज को किसी ने नहीं देखा।
प्रशासन की चुप्पी — एक और अपराध
अब पुलिस, NDRF, वन विभाग, CCTV फुटेज — सब लगे हैं, पर मनोज का अब तक कोई सुराग नहीं।
क्या इतने बड़े अभियान के बाद भी एक लड़के का सुराग नहीं मिल पाना, हमारी व्यवस्था की विफलता नहीं है?
क्या पहाड़ के एक गरीब परिवार का बेटा अगर खो जाए, तो उसकी खोज़ इसीलिए धीमी पड़ जाती है क्योंकि उसके पीछे कोई “राजनीतिक आवाज़” नहीं है?
मनोज सिर्फ एक लड़का नहीं था… वो एक सपना था
मनोज अपने माँ-बाप की उम्मीद था।
उसका पसीना हेमकुंड की चढ़ाई पर हर रोज़ बहता था, ताकि घर में रोटी पक सके।
अब उसकी माँ की आँखों में नींद नहीं, बस सवाल हैं।
अब चुप रहना गुनाह होगा
हमें उठना होगा — आवाज़ बनना होगा उस लड़के की, जो अब खुद बोल नहीं सकता।
हमारी मांग है:
घटना की CBI या उच्च-स्तरीय न्यायिक जांच हो।
घोड़े के मालिक देवेंद्र चौहान और उसके साथियों से गहन पूछताछ हो।
पुलिस द्वारा देर से कार्रवाई और सूचना न देने की जवाबदेही तय हो।
CCTV फुटेज और मोबाइल लोकेशन ट्रेसिंग में तेज़ी लाई जाए।
क्योंकि ये सिर्फ मनोज की नहीं… हम सब की कहानी है
अगर आज मनोज को न्याय नहीं मिला,
तो कल कोई और मनोज ऐसे ही गायब होगा… और हम सिर्फ चुप रह जाएंगे।
हमें मनोज की तलाश नहीं — अब न्याय चाहिए।
📢 अगर आपकी आंखों में आँसू हैं, तो आवाज़ भी होनी चाहिए। इसे पढ़ें, साझा करें और प्रशासन तक पहुँचाएँ।
🙏
मनोज के लिए — न्याय की आवाज़ बनें।
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