
एक जनचेतना जो अब आंदोलन बन चुकी है
“मनोज कहाँ गया?” अब नहीं — “मनोज को किसने मारा?” यह सवाल हर दिल में है।
29 जून 2025 की रात को एक युवा — मनोज सिंह,
जो घाँघरिया में घोड़े पर श्रद्धालुओं को हेमकुंड साहिब तक ले जाता था,
अचानक गायब हो गया।
पुलिस को 10 दिन लगे गुमशुदगी दर्ज करने में।
परिवार के आँसू सूखते रहे,
फोन की घंटी बजती रही…
लेकिन जवाब कोई नहीं आया।
और फिर,
13 जुलाई को एक शव पेड़ से लटका मिला।
वो अब नहीं रहा — लेकिन उसकी मौत एक सवाल बन गई है
जिस बेटे के लौटने का इंतज़ार माँ नौमी देवी हर शाम करती थीं,
जिसके लिए पिता सुरेन्द्र सिंह बिष्ट (सेना से रिटायर्ड) ने सब कुछ त्याग दिया —
वो बेटा अब कभी नहीं लौटेगा।
मनोज का सपना था —
तीन महीने काम करके एक नई बाइक खरीदना…
पर अब न बाइक आएगी, न मनोज।
आज नंदानगर की जनता ने सड़कों को सत्याग्रह का मैदान बना दिया
देखिए इन तस्वीरों को —
कोई एक गाँव नहीं, कोई एक परिवार नहीं —
पूरी घाटी, पूरा जनसमुदाय, औरतें-बुजुर्ग-बच्चे तक आज जिला मुख्यालय पर जमा हुए।
“मनोज को न्याय दो”
“CBI जांच हो”
“साज़िश का पर्दाफ़ाश करो”
“हमारे बेटे के हत्यारों को पकड़ो”
ये नारे नहीं,
ये माँओं की चीखें थीं,
ये बहनों की सिसकियाँ थीं,
ये पिता के टूटे सपनों का प्रतिरोध था।
जनता के सवाल जो आज हवा में गूंजे:
पुलिस को 10 दिन क्यों लग गए FIR दर्ज करने में?
शव के पास चप्पल कौन रख गया?
झगड़े के बाद मनोज को सुरक्षा क्यों नहीं दी गई?
देवेन्द्र चौहान से क्या निकला पूछताछ में?
मनोज के शरीर पर मिट्टी और पौधों के निशान क्यों थे?
ये सवाल हवा में नहीं खोने चाहिए —
इनका जवाब चाहिए, और अभी चाहिए।
लेकिन जनता का कहना है — सबूत पहले से सामने हैं, अब देर न की जाए।
जनता की माँग — स्पष्ट और अडिग:
1. CBI या उच्च न्यायिक जांच हो।
2. देवेन्द्र चौहान और अन्य संदिग्धों से सख्ती से पूछताछ हो।
3. CCTV, कॉल डिटेल, मोबाइल लोकेशन की गहन जां
4. मनोज के परिवार को नियमित और पारदर्शी जानकारी दी जाए।
अब चुप रहना गुनाह है
मनोज एक युवा था —
उसकी मौत अगर यूँ ही साज़िश के धुंध में खो गई,
तो कल कोई और मनोज इस व्यवस्था की बेरुख़ी का शिकार बनेगा।
आज नंदानगर जागा है —
और उसने प्रशासन को चेतावनी दे दी है —
“अब कोई चुप नहीं रहेगा।”
श्रद्धांजलि नहीं, संघर्ष चाहिए — तभी मिलेगा न्याय
मनोज अब हमारे बीच नहीं है,
लेकिन उसकी माँ की आँखों में आज भी आँसू हैं,
उसके पिता की आवाज़ में एक सैनिक की पीड़ा है।
हम सब को उसका स्वर बनना है।
हर गाँव, हर बाज़ार, हर सोशल मीडिया पोस्ट —
“मनोज को न्याय मिले” — ये गूंजनी चाहिए।
“बहुत देर कर दी हुज़ूर आते-आते… अब और देर न हो”
इस बार न सिर्फ़ जवाब चाहिए — इस बार इंसाफ़ चाहिए।
नीचे दिखाई गई तस्वीरें आज की जनचेतना की ऐतिहासिक मिसाल हैं —
जहाँ नंदानगर की जनता ने अपने बेटे के लिए आवाज़ उठाई।
इस लेख को गाँव-गाँव, सोशल मीडिया, और हर जनप्रतिनिधि तक पहुँचाइए —
ताकि मनोज के साथ जो हुआ, वो किसी और के साथ न हो।




