एक युवा की रहस्यमयी मौत और नंदानगर की न्याय के लिए लड़ाई

उत्तराखंड की शांत वादियों में बसी नंदानगर घाटी आज एक गहरी टीस के साथ जाग रही है। एक मां की गोद सूनी हो गई, गांव की चौपाल पर सन्नाटा है और युवाओं की आंखों में आक्रोश—क्योंकि 21 वर्षीय मनोज बिष्ट अब इस दुनिया में नहीं रहा। लेकिन इस मौत ने जो सवाल खड़े किए हैं, वे किसी एक गांव के नहीं, पूरे समाज के लिए गूंज बन चुके हैं।

घटना की पृष्ठभूमि: वेतन विवाद और रहस्यमयी गुमशुदगी

29 जून 2025, घांघरिया—हेमकुंड साहिब यात्रा का व्यस्त पड़ाव। नंदानगर (बांजबगड़ गांव) निवासी मनोज बिष्ट, जो स्थानीय खच्चर-घोड़ा स्वामी देवेंद्र सिंह चौहान के यहाँ मजदूरी कर रहा था, उस दिन वेतन मांगने के बाद विवाद में उलझ गया। बताया गया कि विवाद इतना बढ़ा कि मनोज को शारीरिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी। मनोज ने घांघरिया पुलिस चौकी में शिकायत दर्ज कराई, लेकिन पुलिस ने मामले को ‘समझौते’ में तब्दील  दिया। उसी रात से मनोज लापता हो गया।

10 दिन बाद मिला शव, फिर भी जवाब अधूरे

कई दिनों की खोजबीन के बाद मनोज का शव घांघरिया के जंगल में एक पेड पर लटका मिला। स्थानीय प्रशासन ने पोस्टमार्टम कराया, जिसकी वीडियोग्राफी भी की गई, लेकिन रिपोर्ट में मौत का कारण स्पष्ट नहीं हुआ। रिपोर्ट में यह अवश्य कहा गया कि मृत्यु करीब दस दिन पहले हुई थी, परंतु मृत्यु का कारण “स्पष्ट नहीं” बताया गया।

अब बायोकेमिकल जांच (विसरा परीक्षण) के लिए फेफड़े, हृदय, आंतें, त्वचा और अन्य अंगों के सैंपल देहरादून फोरेंसिक लैब भेजे गए हैं। परिजन, ग्रामीण और जनप्रतिनिधि सवाल कर रहे हैं—आखिर कौन है मनोज की मौत का जिम्मेदार?

नंदानगर की आवाज़: “हमारे बेटे के लिए न्याय चाहिए”

मनोज सिर्फ एक युवक नहीं था, वह अपने परिवार का सहारा था, अपने गांव का सपना था, और पहाड़ की मेहनतकश युवा पीढ़ी का प्रतीक था। जब खबर फैली कि मनोज की लाश संदिग्ध हालात में मिली है, नंदानगर के गांवों में आक्रोश की लहर दौड़ पड़ी।

ग्रामीणों ने एकजुट होकर प्रशासन से जवाब मांगा। पुलना और भ्यूंडार के ग्रामीणों ने भी मनोज को श्रद्धांजलि अर्पित की और स्पष्ट शब्दों में कहा—”दोषी को कड़ी से कड़ी सज़ा मिलनी चाहिए, चाहे वह कोई भी हो।”

बांजबगड़ और आसपास के गांवों के लोगों द्वारा जिला मुख्यालय मै जुलूस निकाले गए, पोस्टर लगे, न्याय की मांग को लेकर आंदोलन हुए। व्यापार मंडल घांघरिया ने भी  शोकसभा आयोजित की। स्थानीय जनप्रतिनिधियों और पत्रकारों ने भी प्रशासन पर दबाव बनाया कि इस मामले को “साधारण हादसा” बताकर न टाल दिया जाए।

अब क्या आगे…?

पुलिस अधीक्षक सवरेश पंवार ने पुष्टि की है कि घोड़ा-खच्चर स्वामी देवेंद्र सिंह चौहान, उसका बेटा संदेश चौहान और सहयोगी योगेश को गिरफ्तार किया गया है। लेकिन लोगों का कहना है कि जब तक मौत का सच सामने नहीं आता, तब तक न्याय अधूरा है।

नंदानगर के लोगों की मांगें साफ़ हैं:

फास्ट ट्रैक कोर्ट में मुकदमा चले।

जांच की पारदर्शिता सुनिश्चित हो।

मनोज के परिवार को पर्याप्त मुआवज़ा मिले।

हेमकुंड यात्रा मार्ग पर मजदूरी करने वालों की सुरक्षा सुनिश्चित हो।

अंत में: मनोज की खामोश पुकार

मनोज की खामोशी बहुत कुछ कह रही है। वह पहाड़ के हर उस नौजवान की आवाज़ है जो रोजगार की तलाश में अपने गांव से दूर काम करता है, वह उन परिवारों की पीड़ा है जिनके बेटे शहरों में या तीर्थ मार्गों पर मजदूरी करते हैं।

इस लेख के माध्यम से एक ही प्रश्न हम सभी के सामने है—क्या मनोज को न्याय मिलेगा? या एक और पहाड़ी बेटा यूं ही खामोश दफ्न हो जाएगा व्यवस्था की चुप्पी में?

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