यह तस्वीरें केवल टूटे घरों और खिसके पहाड़ों की नहीं हैं, बल्कि उन सपनों की हैं जो बरसों की मेहनत से खड़े हुए थे और एक पल में मलबे में बदल गए।

चमोली का नन्दा नगर बैंड बाज़ार — जहां से 55 गाँवों की रोटी-रोज़ी चलती है — आज मौत के साए में है। ऊपर पहाड़ से खिसकता मलबा धीरे-धीरे पूरे कस्बे को निगलने की ओर बढ़ रहा है।

पहली तस्वीर हमें साफ दिखाती है कि किस तरह पहाड़ का एक बड़ा हिस्सा दरककर सीधा बाजार की तरफ लुढ़क आया है। हर रंग-बिरंगे मकान के पीछे एक परिवार है, जिनके माथे पर इस वक्त केवल एक सवाल है – कब तक सुरक्षित हैं हम?

दूसरी तस्वीर और ज्यादा दर्दनाक है। यह किसी गरीब परिवार का घर है, जो अब केवल मलबा बनकर रह गया। टूटी दीवारें, बिखरे सामान और आंसू भरी आंखें… यह सब उस त्रासदी का गवाह हैं, जो शायद प्रशासनिक कागजों पर केवल “भूधंसाव” कहकर दर्ज हो जाएगी, लेकिन जिन लोगों ने अपना सब कुछ गंवाया है, उनके लिए यह जीवन भर का सदमा है।

प्रकृति की मार और हमारी विकास की गलतियों ने मिलकर नन्दा नगर को तबाही के मुहाने पर खड़ा कर दिया है।

क्या कारण है कि हर साल पहाड़ों में ऐसी दरारें चौड़ी होती जा रही हैं?

क्यों बाजारों और बस्तियों की योजना बिना भौगोलिक मजबूती समझे बनाई जाती है?

और सबसे बड़ा सवाल – बेघर हुए इन परिवारों की जिंदगी कौन लौटाएगा?

आज नन्दा नगर केवल राहत शिविरों में सिमटकर रह गया है। 64 लोग बेघर हैं, 16 मकान खतरे में हैं और बाजार की दर्जनों दुकानें कभी भी जमींदोज हो सकती हैं।

यह सिर्फ एक कस्बे की त्रासदी नहीं है, बल्कि पूरे उत्तराखंड के लिए चेतावनी है। अगर हमने अभी भी पहाड़ों की संवेदनशीलता को समझकर ठोस कदम नहीं उठाए, तो कल नन्दा नगर ही नहीं, पूरा राज्य दरारों में समाता चला जाएगा।

नन्दा नगर की ये तस्वीरें हमसे यही कह रही हैं –

“बचाओ हमें, वरना यह पहाड़ और ये बस्तियां सिर्फ कहानियों में रह जाएंगी।”

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