जब धरती सांस लेती है हरियाली में

गुनगुनाती हैं, whose पर्वत ऋषियों की तपस्थली हैं, और जिसकी वादियाँ लोकगीतों से सराबोर रहती हैं। यहाँ का हर पर्व प्रकृति से जुड़ा है, और उनमें सबसे आत्मीय, सबसे जीवन्त पर्व है — हरेला।

हरेला कोई आम त्योहार नहीं — यह एक ऐसा उत्सव है, जब धरती मां की गोद फिर से हरी होती है, जब मानव और प्रकृति के बीच का पुरातन रिश्ता फिर से जीवित होता है।

पौराणिकता: शिव-पार्वती के विवाह से जुड़ी हरियाली की कथा

श्रावण मास, जिसे देवों का प्रिय मास कहा गया है, उसी की संक्रांति को हरेला मनाया जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, इसी दिन शिव और पार्वती का दिव्य विवाह सम्पन्न हुआ था। शिव, जो कण-कण में बसते हैं, और पार्वती, जो स्वयं पृथ्वी हैं — उनके मिलन की स्मृति में जब बीज धरती में बोया जाता है, तो मानो पूरी सृष्टि उस हरियाली में आशीर्वाद बनकर प्रकट होती है।

“हर” यानी शिव, “एला” यानी पृथ्वी — इस प्रकार हरेला का अर्थ है धरती की हरियाली और शिव का वरदान।

कुमाऊँ: घर आंगन से लोकगाथाओं तक फैला हरियाली का उत्सव

कुमाऊँ में हरेला जीवन की शुरुआत से जुड़ा पर्व है। घर की स्त्रियाँ जब पत्तलों में सात अनाज बोती हैं — जौ, धान, उड़द, मक्का, गेहूं, भट्ट और सरसों — तो वह केवल अन्न नहीं बो रही होतीं, वे आशा और आशीर्वाद बो रही होती हैं।

दसवें दिन, जब ये बीज अंकुरित होकर “हरेला” बनते हैं, तो उन्हें घर के बुज़ुर्ग आशीर्वाद रूप में बालकों के सिर में रखते हुए यह आशीष देते हैं —

“जी रया, ठुल रया, फूली-फली रया।”

(जीवित रहो, बड़े बनो, फूलो-फलो।)

कुमाऊँ के गाँवों में इस दिन लोकगीत गूंजते हैं, नाटक खेले जाते हैं, और नन्हे पौधे रोपे जाते हैं, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ न केवल धरती से, बल्कि अपने अतीत से भी जुड़ी रहें।

गढ़वाल: खेतों, जंगलों और आकाश से बंधी पूजा की डोर

गढ़वाल में हरेला खेती-बाड़ी और पर्यावरण संतुलन का प्रतीक पर्व है। यहाँ इस दिन गाय-बैलों की पूजा, हल-बैल की आरती, और खेतों की परिक्रमा की परंपरा है। गढ़वाली संस्कृति में, जहाँ श्रावण मास शिव को समर्पित है, वहीं हरेला के बीज आस्था और कृषि के मिलन का प्रतीक बनते हैं।

यह पर्व सामूहिकता का भी पर्व है — गाँव के लोग मिलकर पौधरोपण करते हैं, साथ बैठकर पारंपरिक भोजन करते हैं, और लोकगायन में जीवन के राग गाते हैं।

“हे भवानी माता हरेला लायो,

धान फूले, जौं फूले, घर में सुख आयो।”

जौनसार-बावर: देवभूमि की पुरखों से चलती परंपरा

जौनसार, जहाँ आज भी पुरातन देव परंपराएँ जीवित हैं, वहाँ हरेला मात्र एक ऋतु पर्व नहीं, बल्कि देवताओं की कृपा और जीवनचक्र का उत्सव है। यहाँ इसे ‘हरेल’ या ‘बिरोड़ी’ कहा जाता है।

यहाँ की महिलाएं बीज बोने से पहले ग्राम देवता की अनुमति लेती हैं। हर हरेले में देवताओं को समर्पित किया गया हिस्सा अलग निकालकर चढ़ाया जाता है। लोग मानते हैं कि जब धरती में बीज बोया जाता है, तो वह पुरखों की आत्मा से संवाद करता है।

जौनसारी भाषा में बोले जाने वाले गीतों में पशुपालन, खेती और देवभावना का वर्णन होता है —

“देवथों की स्याळी हरेला ल्याई,

ज्यो बरसै कुदरत, धन्य हुई धरती।”

हरेला और पर्यावरण: जो बोया जाएगा, वही उगेगा

उत्तराखंड में हरेला अब केवल परंपरा नहीं रहा, यह पर्यावरण चेतना का प्रतीक बन चुका है। आज यह पर्व हजारों पेड़ लगाने का अभियान बन गया है। स्कूलों, नगरों और संस्थाओं में हरेला उत्सव के रूप में वृक्षारोपण किया जाता है। बच्चे भी सीखते हैं —

“जैसे घर के आंगन में बीज बोया, वैसे ही जीवन में भी संस्कार बोना है।”

एक मार्मिक प्रसंग: बूढ़ी माँ का आशीर्वाद

गढ़वाल के एक गाँव में, एक वृद्धा जो अब खेतों तक नहीं जा सकती, हर साल हरेले के दिन अपने घर की कच्ची जमीन में मिट्टी का छोटा पात्र रखती है, और कांपते हाथों से कुछ जौ के बीज बो देती है। दस दिन तक वह हर सुबह सूरज निकलते ही उसे पानी देती है और कहती है —

“इन बीजों में मेरा बेटा भी उगे, जो परदेस में है, और मेरी परछाईं भी बचे इस घर में।”

हरेला उसके लिए केवल हरियाली नहीं, उम्मीद का बीज है।

उपसंहार: जब पर्व प्रकृति से संवाद बन जाए

उत्तराखंड का हरेला केवल एक पर्व नहीं, एक दर्शन है —

यह धरती का सम्मान है,

यह मानव और प्रकृति के रिश्ते की पुनर्पुष्टि है,

यह पूर्वजों की स्मृति और आने वाली पीढ़ियों के लिए उत्तरदायित्व है।

हरेला हमें सिखाता है —

“जहाँ बीज हैं, वहाँ भविष्य है। जहाँ हरियाली है, वहाँ ईश्वर है।

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